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Saturday, December 23, 2017

Film-LIBRARY by S S DOGRA ......Review By Dr Poonam Matia





‘Akshar’ is ‘Brahma’ and ‘Books’ are the holy places where this God’ resides.
Books have always been quoted as ‘windows to the world’.  In the past few decades ‘Google Baba’ has been trying to replace books as far as ‘jet speed’ younger generation is concerned.

There is no denying the fact that the technology and the pace of its innovation certainly asks us to move our fingers or ‘mouse in’ the information on Internet. It’s like taking a dip in the vast ocean and catching a fish to be served as ‘hot meal’ or seeking pearls to adorn our neck or Crown. But, the books have had created such a niche in our lives which is irreplaceable. Additionally, this treasure is not hidden but very well showcased in temples called LIBRARIES.

The short movie ‘Library’ is a great attempt by the Producer, Writer and Director Sh. S. S. Dogra in the direction of reviving the concept of using Libraries.

In today’s world also, if we can just scan the ‘Biopics’  of  successful people instead of being envy of their success , we surely, would find the ‘habit of constant reading’. Their closets would showcase best literature of philosophy, human-psyche, management (be it time or otherwise), motivational anecdotes besides the literature of their respective fields.
Libraries are referred to as temples not for the namesake. There are valid signs easily noticeable in the film-‘Library’ . The notice on the wall clearly read by the librarian-‘no smoking, no cell-phones, no loud music and no high-heeled sandles or shoes making noise’.  Don’t we take care of these while entering any holy place? In fact, all these are a must requisite to the calm, quiet and serene environment conducive to reading, meditation or worship.

Be it media or any other field, libraries hold the keys to success.  It’s we, who have to take a step forward and develop the habit of reading rather than ‘copy-cut-paste’ practice. Holding the books and reading at leisure can never be replaced by active searching of ‘net’.
A well organized library as of Russian Culture Centre, shown in the said film is nothing less than an al-time favourite friend having solution to any problem.
Laurels are due to the film makers and actors’ team to think and move in the direction of imbibing the library-culture which has been seen losing grounds. I would certainly like to congratulate Dogra ji for beautifully promoting his latest book –‘Media can do wonders in students’ lives’
And last but not the least, let us all make friends with the books and applaud the concept of ‘library’ and its role in success as encapsulated in this very short film. 

https://www.youtube.com/watch?v=Xr9Ff184ulQ&feature=youtu.be

Dr. Poonam Matia (Honourary)
M sc. B Ed. MBA , MA(pursuing)
writer, poetess , anchor , literary editor- true media
Contact:  Address:90 B, Pocket A, Dilshad Garden , Delhi-110095 
Phone: 22598764 , 9312624097
e mail : poonam.matia@gmail.com 

Monday, October 23, 2017

कहानी -विज्ञापन- नन्हे-नन्हे चमकीले तारे .......... पूनम माटिया




विज्ञापन- नन्हे-नन्हे चमकीले तारे
टीवी की स्क्रीन पर आँखें गढ़ाये सुनीति विज्ञापन देख रही थी……
अगर आपकी इच्छा के बगैर कोई आपको छूता है तो यहाँ फ़ोन करें”,
मेरी बस का कंडक्टर मुझे छूता है”, 
मेरे मामा मेरे साथ गन्दी हरक़तें करते हैं और कहते हैं कि तुम्हारी मम्मी की सहमती से ही हो रहा है|”
छि!!!!!!!!   अनचाही बूँदें आँखों से छलक गालों तक ढुलक आयीं|
ज़माना कितना ही बदल जाए, कुछ बातें हर दौर में वैसी ही रहती हैं, शायद!
उसकी नज़रों के सामने उसका ख़ुद का बचपन चलचित्र की भांति चलायमान था
|
सुनीति बेटा! ज़रा ये मिठाई ऊपर वाली बड़ी अम्मा जी के यहाँ दे आ”, कपड़े धोते-धोते माँ रसोई में आयीं और किसी शादी में मिली मिठाई एक छोटी प्लेट में डालकर रुमाल से ढकती हुई बोली थीं| नादान, घुम्मकड़ छुटकी-सी सुनीति ठुमकती हुई ऊपर पहुँची परन्तु बड़ी अम्मा जी तो दिखाई नहीं दीं| चाचा जी थे, झट गोदी में उठाकर बोले-लाओ मैं ले लेता हूँ मिठाई|
बदन में झुरझुरी-सी छूटी और नन्ही सुनीति हिचकिचाहट में गोदी से उतर भागी, सीढ़ियाँ उतर कर ही चैन की साँस ली| वो दिन और आज का दिन, चाहे कोई बहाना बनाना पड़े, वो फिर कभी अकेले ऊपरनहीं गयी|
पाँच साल की बच्ची सिहर गयी थी उस अजीब, शरीर में गड़ती हुई छुअन से| तब से पहले मम्मी ने, कभी पापा ने, दीदी ने, भाई ने निहालाते हुए, गोदी उठाते हुए छुआ था किन्तु इस तरह अजीब कभी नहीं लगा था| नहीं पता था, यह क्या था पर इतना तो लगा कि कुछ ग़लत हुआ|
फ्रॉक से कब सलवार-कमीज़ पहनने वाली हो गयी सुनीति, समय का पता ही नहीं चला| एक बार कोशिश भी की थी माँ को बताने की पर माँ तो चाचाकी तारीफ़ करते नहीं थकती थी, तो कहती भी किससे और कैसे|
गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जाने की उत्सुकता के बीच भी सुनीति डरी-सी रहती| ख़ुशी की चहक में कहीं एक अन्जाना डर भी रहता था| यहाँ-वहाँ, अड़ोस-पड़ोस के सभी बच्चे छत पर खेलने जाते और रात में वहीं खुले आसमां के नीचे सभी बच्चे-बड़े बिस्तर बिछा कर सोते| रात के गहरे अँधेरे में अचानक एक हाथ आता और उसे अपने लड़की होने का भद्दा एहसास कराता किन्तु रात का सन्नाटा उसे अपनी सिसकी को निगल, आँखें और ज़ोर से भींच लेने को बाध्य कर देता और दिन! दिन का  का  उजाला उससेनज़रें चुराकर, झुका के चलने को|
माँ से जब ‘चाचा’ के बारे में कह नहीं पाई तो वहाँ ननिहाल में क्या बताती जहाँ सब ‘अपने’ ही थे|

एक दुस्वप्न-सा अतीत आज सुनीति के गले में अटक रहा है और वह टेलीविज़न के सामाजिक सरोकार के विज्ञापन में बोलते हुए उन नन्हे बच्चों में स्वयं को देख रही थी| ये सरकारी एजेंसियाँ तब कहाँ थीं मदद के हाथ के साथ जब लाज, शर्म का पहरा और शीई.ईश.श..!!!!!!! मुंह पर चुप्पी की टेप लगानी पड़ती थी ....एक उबकाई-सी आई पर अचानक डोर-बैल बज उठी  -ट्रिन ट्रिन ..............|
सुनीति की तन्द्रा टूटी| अपने गर्भ में पल रहे शिशु को सहलाने उसके हाथ पहुँच गए ....... वह लम्बी साँस लेते हुए उठी, आशीष के आने का समय थावो ऑफिस से आ गए| सोच में खोई सुनीति के पाँव स्वत: ही रसोईघर की ओर बड़ चले चाय-नाश्ते के लिए|
उसी हालत में आशीष के साथ यंत्रवत-सी चाय पीती वह अब भी खोई-खोई थी|
आशीष पूछ ही बैठे क्या हुआ? कोई परेशानी?
सुनीति झटके से सीधे बैठते हुए बोली-नहीं तो!
विवाह के दो बरस हो गए थे| आशीष इतना तो समझते थे कि कुछ तो है| वो बोले -किसी ने कुछ कहा क्या?
सुनीति फूट पड़ी- “कौन देता है अधिकार बिना उनकी इच्छा के बच्चों के शरीर को अपनी गन्दी सोच से मैला करने का, उनके  कोमल मन को आहत, आतंकित करने का| क्यूँ ये इंसान इंसान नहीं रहते, पशु बन जाते हैं? क्या ये छोटे-छोटे बच्चे ख़ासकर लड़कियाँ सच में फ़ोन कर सकते हैं अपनी परेशानी बताने को, क्या कोई इनकी बात सुनेगा, कोई इनकी हालत समझेगा?

कौन
-से बच्चे, क्या हालत? हमारा बच्चा तो अभी इस दुनिया में आया भी नहीं| सुनीति तुम किस बच्चे की बात कर रही हो?-आशीष ने पूछा|
“क्या तुम तब ही कुछ करोगे जब तुम्हारे अपने बच्चे के साथ कुछ होगा? आखिर आज के समाज को हो क्या गया है जो दूसरे की समस्या को अपनी समस्या नहीं समझता, और यह तो वह समस्या है जो हमारे समाज को जोंक की तरह खाए जा रही है, बचपन को ख़त्म किए जा रही है......” सुनीति लगातार बोलती जा रही थी|
“पर! सुनीति मुझे कुछ समझ तो आये कि किसका बचपन छिन गया, समाज पर कौन सा पहाड़ टूट पड़ा| लगता है तुम्हारे अन्दर की समाज-सेविका फिर जाग गयी है| याद है तुम्हे पिछली बार हमने सड़क पर पड़े घायल आदमी की मदद की थी तो अस्पताल वालों ने उसकी मरहम-पट्टी करने से भी मना कर दिया था और कहा था कि जब तक पुलिस नहीं आयेगी तब तक हम हाथ भी नहीं लगायेंगे| फिर तुमने पुलिस ही बुलवा ली थी, उसके बाद पुलिस ने थाने के कितने चक्कर लगवाए थे, मेरी तो नौकरी जाते-२ बची थी|”
“उस इंसान की जान तो बच गयी थी”- सुनीति ने तपाक से ऐसे कहा जैसे हर बात का जवाब वो पहले से ही सोच कर बैठी थी और आशीष उसके चेहरे की तरफ देखता रह गया| उसे समझ आ गया था कि सुनीति अब किसी की सुनने वाली नहीं और जो वो सोच रही है कर के ही मानेगी|
“फिर भी सुनीति तुम अपनी हालत तो देखो, क्या इस परिस्थिति में तुम्हे इतना तनाव लेना सही लगता है?”
पर सुनीति कहाँ कुछ सुन रही थी, वो तो लगातार बुदबुदाती जा रही थी|
आशीष ने सुनीति की बुदबुदाहट को ध्यान से सुनने की कोशिश की| थोड़ी कोशिश करने पर उसे साफ़-२ सुनाई देने लगा-
“.....यही कि कोई घर का, आस-पड़ोस का, कोई बहुत ही अपना, जाना-पहचाना व्यक्ति इन बच्चों का शारीरिक शोषण कर रहा है, इनके स्वाभिमान के नाज़ुक शीशे पर भद्दी लकीरें डाल रहा है  जो शरीर के साथ-साथ इनके दीमाग में ज़्यादा गहरी हो रहेंगी..........” - सुनीति अपनी रौ में बोलती जा रही थी|
पर कोई ‘अपना’ ही कैसे बालमन को ठेस पहुँचाना चाहेगा, क्यों उनके कोमल शरीर से छेड़-छाड़ करेगा?
आपको नहीं मालूम, आशीष किन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है, अपनी माँ तक से कुछ कहना भी असंभव सा हो जाता है| ‘अपनों’ की ये छुअन परायों की गाली से भी बदत्तर अनुभव होती है| और तो और चुपचाप सहने और स्वयं में सिकुड़ने के अतिरिक्त कोई चारा नज़र नहीं आता|
चाय पीते-२ आशीष किसी गहरी सोच में था उसके पास सुनीति के द्वारा दिए गए तथ्यों का सच में कोई जवाब नहीं था साथ ही उसे ये अभी भी लग रहा था कि सुनीति को इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए
| ये सोचते-२ वो अपने अतीत में जाता जा रहा था क्योकि कुछ उसे भी अन्दर से झंझोड़ रहा था| वो समझ नहीं पा रहा था ऐसा क्या है जो उसे शांत नहीं होने दे रहा| काफ़ी देर अपने अतीत को खंगालने के बाद उसे याद आई वो बात जब वो ख़ुद भी पड़ोस के एक अंकल के द्वारा शारीरिक शोषण का शिकार होते-२ बचा था| उसने तो उन अंकल के खिलाफ़ आवाज़ भी उठाई थी और उसके पिता ने बात समझ कर उन अंकल को लताड़ भी लगाई थी| उसके बाद बात आई-गई हो गयी थी पर आज वो नज़ारा उसकी आँखों के चलचित्र की तरह चल रहा था | आशीष अब सोच रहा था कि अगर उसके पिता ने ध्यान नहीं दिया होता तो क्या होता और यह सोचते-२ उसकी आँखों के सामने से छाई धुंध अब हटने लगी थी | अब सुनीति की बात उसे समझ आने लगी थी और चाय का कप रख, सोफे से उठ आशीष सुनीति के पास आ गये, उसके कंधे दबाए, हाथ थाम कर बोलेसमझता हूँ मैं पर जब एक अच्छी पहल हुई है तो उसका अंजाम भी अच्छा ही होगा| आज के बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल हम से जल्दी और बेहतर जान जाते हैं| अगर वे आवश्यकता समझेंगे तो ज़रूर उसकी ख़बर भी इन एजेंसीज़ तक पहुंचेगी| न होने से कुछ होना तो अच्छा है|
बस ज़रुरत है कि उनके अपने भी उनके मौन को सुने
, उनके सहमे चेहरों पर डर की छाया को देख पायें| इस भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में अपने बच्चों को भी समय दें, उनके दोस्त बने ..... घर में ऐसा वातावरण दें कि बच्चें उनके साथ खुल के बात कर सकें| और फिर आज के बच्चे हमारी-तुम्हारी तरह चुप बैठने वाले नहीं, सुनीति| ‘जेटएजके बच्चे अपना अच्छा, बुरा जल्दी समझ जाते हैं| माना कि कुछ लोग नहीं बदलते, उनकी हैवानी फ़ितरत नहीं बदलती, छोटी हो या बड़ी उम्र, बड़े-बूढ़े भी ग़लत हरक़तों से बाज़ नहीं आते किन्तु सकारात्मक सोच रख आशा के दीप जलाना है, रोशनी होगी, तम छटेगा ही|
सुनीति की गीली आँखों में भी एक नई चमक थी और अपने भीतर पलती नयी जान को सहलाते हुए वह बालकनी में आ गई| मूसलाधार बारिश के बाद अब आसमान साफ़ हो गया था, काले बादल छंट गए थे .....नन्हे-नन्हे चमकीले तारे यहाँ-वहाँ बच्चों-सी खिलखिलाहट लिए आसमानी मैदान में आँख-मिचौनी खेलने निकल आये थे .......|
...... डॉ पूनम माटिया (मानद)
(4
अगस्त 2017)
कवि
, लेखिका, संचालिका
एम एस सी, बी एड , एम बी ए , एम ए हिंदी(अध्ययनरत)
poonam.matia@gmail.com
9312624097




Thursday, August 31, 2017

शिक्षा करती है सुना सामाजिक कल्याण ............ कहानी --पूनम माटिया


शिक्षा करती है सुना , सामाजिक कल्याण
कन्या फिर भी मर रहीं ,बचते नाही प्राण ..........पूनम माटिया 
पढ़िए मेरी कहानी ......अक्षर शिल्पी में 


Thursday, July 20, 2017

गीत-कब आओगे साजन?



आकर तुम मत जाना साजन,
आकर तुम मत जाना ...

जब आँगन में मेघ निरंतर झर-झर बरस रहे हों
ऐसे में दो विकल हृदय मिलने को तरस रहे हों
जब जल-थल सब एक हुए हों, धरती-अम्बर एकम
शोर मचाता पवन चले जब छेड़-छेड़ कर हर दम
ऐसे में तुम आना साजन! ऐसे में तुम आना
आकर तुम मत जाना साजन..........

कंपित हो जब देह, नेह की आशा लेकर आना
प्रेम-मेंह की एक नवल परिभाषा लेकर आना
लहरों से अठखेली करता चाँद कभी देखा है?
या आतुर लहरों का उठता नाद कभी देखा है?
चंदा बन के आना साजन! चंदा बन के आना
आकर तुम मत जाना साजन..........

पल-प्रतिपल आकुल-व्याकुल मन, राह निहारे हारा
तुम आये, ना पत्र मिला, ना कोई पता तुम्हारा
फागुन बीता, बीत गया आषाढ़ कि आया सावन
कब आओगे, कब आओगे, कब आओगे साजन?
आकर तुम मत जाना साजन...........


...........पूनम माटिया

Tuesday, May 16, 2017

शोचनीय .........



किसी भी बर्तन की तरह ख़ुद को भीतर से मांजना अधिक पड़ता है ........... क्योंकि पात्र में वस्तु अन्दर ही परोसी जाती है .......पुन: -पुन: उपयोग करने के लिए उसकी सफाई भीतर ही अधिक आवश्यक है .......... थोड़े कहे को बहुत समझिये .........ऐसा मेरे बाबा /दादा कहते थे .......... पूनम माटिया 

Tuesday, April 11, 2017

गीत -राम मेरे...

राम मिले सीता को जैसे , मुझको भी तुम मिल जाओ 
तोड़ धनुष को वरण करो तुम, राम मेरे तुम बन आओ
नहीं मांगती बंगला गाडी, नहीं मांगती मैं सोना 
कुछ छोटे-छोटे सपने हैं, आकर पूरे कर जाओ............................ राम मेरे तुम बन आओ
युग-युग से प्यासी है धरती, आकर अगन बुझा जाओ 
घट-घट बैठी कोटि अहिल्या, आकर उन्हें जिला जाओ.........................राम मेरे तुम बन आओ

दुर्योधन
, दशग्रीव बने सब , नारी हाहाकार करे मर्यादा पुरुषोत्तम हो तुम, आकर पाठ पढ़ा जाओ....................     ......राम मेरे तुम बन आओ

साधू-संत सियाने जितने
, सब माया के लोभी हैं बच न सकी सोने की लंका, त्रेता याद दिला जाओ ..........................राम मेरे तुम बन आओ
.........................पूनम माटिया 

Sunday, April 9, 2017


जाम था, तिश्र्नगी रही फिर भी
वस्ल था,
बेकली रही फिर भी

ज़िन्दगी ज़िन्दगी न थी यूँ तो
शान से वो तनी रही फिर भी

ज़िन्दगी से बहुत निबाह किया
ज़िन्दगी अजनबी रही फिर भी

तेरा आना   था  ज़रूरी,पर
आस दिल में बँधी रही फिर भी
                      
यूँ तो सब आस-पास  थे  मेरे
तेरे बिन कुछ कमी रही फिर भी

लाख चाहा न डगमगाएं हम
रात दिन बेख़ुदी रही फिर भी

ढक लिया चाँद अब्र ने तो क्या
रात ‘पूनम’ की ही रही फिर भी                    ........ पूनम माटिया