सधवा से विधवा हुई क्या मेरा कसूर था ?
उससे भी पहले पैदा हुई
क्या मेरा कसूर था ?
एक घर से दूजे घर भेजी गयी
क्या मेरा कसूर था ?
जनी बिटिया मैंने
क्या मेरा कसूर था ?
दूसरी औरत के लिए त्यागी गई
क्या मेरा कसूर था ?
शराबी पति द्वारा पीटी गयी
क्या मेरा कसूर था ?
गर नहीं तो
क्यूँ डायन करार दी गयी
क्यूँ जीवित पत्थर में चिन दी गयी
क्यूँ सती कह जिन्दा जलाई गयी
चाहा नहीं देवी बन पूजी जाऊं
चाहा ये भी नहीं पाँव की जूती कहाऊं
चाह सिर्फ एक
इंसा हूँ , इंसा तो मानी जाऊं
इंसा हूँ, इंसा तो मानी जाऊं............poonam ......(इ पत्रिका 'नव्या' में पूर्व प्रकाशित )