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Tuesday, August 11, 2015

फंदा ......... बूँद शब्द, अर्थ है सागर

अभी जब हाल ही में याकूब  को फांसी की सज़ा हुई ...........
तो मुजरिमों को दी गयी फांसी के 'फंदे' को देख ये ख्याल आया होगा .........
और शायद तब ही ये शब्द जाल बुन पाया होगा .....

छोटी थी जब स्वेटर बुनते
माँ ने टोका था मुझको,
‘सारा स्वेटर उधड़ न जाए,
ध्यान तो दें ,कहीं गिर न जाए
बुनते-बुनते ही ये फंदा!!!’
छोटी-सी बुद्धि में तबसे
‘फंदा’ स्वेटर में ही जाना|
और टोकती थी माँ अक्सर
‘धीरे-धीरे खाया कर|’
छोटे-छोटे ग्रास बनाकर
ख़ुद भी कभी खिलाती थी|
‘पानी भोजन-बीच न पीना
लग जाएगा गले में ‘फंदा’’
कह-कह कर ध्यान दिलाती थी|
बदल गए सन्दर्भ सभी!
अब सहज समझ न आता है
क्यों अन्नदाता भारत का
‘फंदे’ को अपनाता है?
क्यूँ बिलखते बच्चे भूखे?
क्यूँ बिन-ब्याही बेटी छोड़
वो जीवन से हार जाता है?
अचरज बहुत होता है जब
बिटिया जो जान से प्यारी है,
बेटा भी आँख का तारा है
पर न जाने क्यों ये ‘फंदा’
बन जाता है गले का हार?
‘खाप’ छीन लेती है क्यूँ
झूठी इज्ज़त की खातिर
बच्चों से ही उनका प्यार|
‘फंदा-फंदा’ कहकर अब तो
शादी नहीं रचाते हैं,
रख परम्पराओं को ताक पे
जाने कितने बच्चे अब
बिन-ब्याहे ही रह जाते हैं|
शादी लगती गले का ‘फंदा’
बिन शादी रास-रचाते हैं|
बूँद शब्द, अर्थ है सागर
जाकि जैसी बुद्धि ठहरी
वैसा ही तो बांचे है |
‘फंदा’ क्यूँ समझें हम इसको
धैर्य से सब सुलझाते हैं|
जीवन बहे सरिता सी धार
पथ निष्कंटक, प्रेम बहार
फंदा-फंदा स्वेटर बुन ले
बाकी सब है व्यर्थ-विकार|
...........
 Poonam Matia