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Sunday, August 12, 2012

मुलाक़ात ............




पूछता है आइना अक्सर, कहाँ गयी तेरी वो मुस्कान अब ?
कैसे बताएं उसे कि उनसे, होती नहीं मेरी मुलाकात अब  ?

दरों-दीवार रहते थे मेरे, जिनके प्यार से रोशन हरदम,
क्या कहें गहरा गयी है, रात सी स्याही सरे शाम अब|

पहलु में मेरे खोये हुए , गुज़रते थे रात –दिन  जिनके,
रास्ते जुदा हुए उनसे, हो गयी ये बात सरे–आम अब|

चटकती थी कलियाँ मेरे दिल की, अहसास से जिनके ,
खिलते नहीं अब गुल वहाँ , मुरझा गयी है हर शाख अब|

बड़े अरमानो से बसाई थी , साथ उनके दुनिया ख़्वाबों की,
बिखर के खत्म हो गयी  , नगरी वो हंसी-महताब  अब|

उनके  साथ कट जाती थी, जो बातों, वादों, मनुहारों में,
क्यों कटती नहीं काटे , वो लंबी सुनसान रात अब |

बड़े गुमान से कहते थे मुझे, अश्क बेशक़ीमती हैं ‘पूनम’,


कौन है जो सम्भालेगा मुझे, समझेगा मेरे जज़्बात  अब |


.............पूनम (N)