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Wednesday, December 18, 2013

विवाह-उत्सव .........









विवाह तो उत्सव होता है खुशी का 
पर जुड़ा है उससे 
उदासी का भी नाता गहरा 
इक ओर पिया के घर है
इन्तेज़ार दुल्हनिया का 

दूजी ओर छूट रहा है
बाबुल से रिश्ता पुराना 

अश्रुपूर्ण आँखों से निहारती 
मैके के छोटे-बड़े रिश्ते सारे 
समझ न सके 'माँ'
पूछे आंसू अपने या निहारे 
बिटिया को आँचल की ओट से


पिताभाई 
ठिठक कर खड़े हैं दूर 
ललना से बिछड़ने को मजबूर 

लड़की की किस्मत
है लिखी कुछ अजीब 
उसका न कोई अपना घर
है न कोई वज़ूद


विवाह है उत्सव खुशी का 
फिर क्यों
पिता-भाई की आँखें हैं नम 
माँ-बेटी के दिल में 
छिपा है कोई गम
................पूनम माटिया (स्वप्न शृंगार से)

Wednesday, September 25, 2013

विश्वास की नींव .........बेटियाँ



सोचती हूँ 
तो सोचती चली जाती हूँ 
जाने क्यूँ 

आँखें नम हो जाती हैं 

नन्ही तान्या, तरंग 
तोतली जुबान में 
'मम्मी ' कहती 
सामने आ जाती हैं

पल-पल बड़ते, दौड़ते, भागते 
खेलते हँसते-झगड़ते 
देखा उनको
कभी नन्हे-२ ग्रास 

खिलाती थी मैं
आज बिठा के 

खाना खिलाती मुझको 


नृत्य, नाटक, 
गृह-कार्य, प्रोजेक्ट
रंग भरे 
हर कला के उनमे
मुझे मंच के लिए अब 

तैयार कराती हैं वो
डांट-डपट के 

नृत्य सिखाती
नेह अपना 

झलकाती हैं वो

घर भर में 
रौनक है उनसे
कल दूजे घर को 

सजाएँगी वो
सूना हो जाएगा आँगन
सोच के दिल 

जब घबराता है मेरा 
तुरंत हँसते हुए
सामने आ जाती हैं वो

अकेलापन
न खलेगा कभी
इस अहसास को पल-पल
दृढ कर जाती है वो
मेरे वज़ूद को
विश्वास की नींव 

दे जाती हैं वो .........................पूनम माटिया 

Tuesday, September 24, 2013

मायाजाल............

जी को जंजाल कितने हैं 
मायाजाल इतने हैं 


कविता भी 
डर के मूह छिपाती है 


ग़ज़ल की बह्र भी 
कहाँ हाथ आती है 


गीत मौन हो
गाये जाने को तरसते हैं 


नज़्म छेड़े कोई कलम
अल्फाज़ लिखे जाने को तरसते हैं 


हम रोजमर्रा की कशमकश से 
निकल जाने को तरसते हैं


बीवी -शौहर किसकी कहें 
एक-दूजे से बात करने को तरसते हैं .....पूनम

Thursday, September 5, 2013

मात-पिता, बंधू-सखा सम तुम्हे हम शीश नवायें

मात-पिता, बंधू-सखा सम 
तुम्हे हम शीश नवायें 
जीवन के अनमोल पाठ सब 
गुरुवर तुमरी कृपा से आयें ..... पूनम


A teacher is different from preacher. 
He doesn’t seclude himself from the process of teaching and learning.


He is an information giver and seeker, both.


He is a guiding force, a mentor, a person whose teachings act as support holding us upright in times of difficulty. 

He is also an initiator who changes mass opinion, who lets us discover ourselves as well as hidden paths leading us on to various inventions and discoveries .

Happy teacher's Day To u all ......... and my tribute to all my teachers ( parents ,teachers ,friends and foes who have contributed to my present being .)
.

Thursday, August 29, 2013

मीलों हैं फैली तन्हाई ................

ऊपर रंगी आसमा है आया चिढाने नीचे बरपी तन्हाई है सीना ताने
हैं शूल ही शूल जहां तक निगाह जाए है रेत ही रेत कहाँ से गुल कोई आये

दूर तक न नामो निशां है इंसानी ज़ात का कोई तो आके ले जायज़ा मेरे हालात का ...................पूनम

Wednesday, August 28, 2013

चक्रधर...............chakradhar..




चक्रधर से कहाँ छिपे हैं आज के असहनीय दृष्टांत 
वो भी होगा परेशां, होगा उसका भी चित अशांत

कोटि-कोटि प्रार्थनाएं पहुँचती होंगी उस तक
कब तक इन सूचनाओं पर न देगा वो ध्यान

उठती होंगी लहरें, मचलते होंगे असंख्य तूफ़ान
कब तक साहिल की सीमाये सकेंगी उसे बांध

दिया था उसने भगवत-गीता में सन्देश
आऊँगा मै जब भी बढेंगे कलियुगी क्लेश

आएगा एक दिन ‘वह’ रूप इंसा का धार कर
लेगा अवतार, दुष्टों का करेगा नाश संघार कर 

अपने नाम का न होने देगा वह अपमान यूँ
सृष्टि रची है उसी ने, न हो ए-इंसा परेशान तू

ढोंगी साधू बेशक रहें जपते माला के मनके
जमाते रहे भीड़,सजाते रहे मस्तक पर तमके

आएगा, जब तो घंटियों की मधुर ताल होगी
गुंजित आसमा और धरा एक पुष्प-माल होगी

देर हो जाये भले न अंधेर होगी, ये विश्वास है मेरा 


चक्र की धार न 'कल' कम थी न 'कल' कम होगी ........poonam 

Wednesday, August 21, 2013

ghazal..................

तुझे सारा जमाना चाहता है||
तुझे दिल में बिठाना चाहता है||

अभी कितना रुलाना चाहता है |
कहाँ तक आजमाना चाहता है||

हमारी सात जन्मों की कसम है |
बता कितना निभाना चाहता है||

मुझे महताब का देकर भुलावा |
तुम्हीं को वो दिखाना चाहता है||

किसी ने बाग़ जंगल सब उजाड़े|
शज़र कोई बचाना चाहता है||

नहीं कुहरा तिरी क़िस्मत ये 'पूनम' |

‘क़मर’ अब जगमगाना चाहता है ||                                 ...........पूनम माटिया 


u can now read it ...In Roman .too.

Tujhe sara zamaana chahta hai |
Tujhe dil meiN bithaana chahta hai ||

Abhi kitna rulaana chahta hai |
KahaaN tak aazmaana chahta hai ||

Hamaari Saat JanmoN ki kasam hai |
Bataa kitna nibhana chahta hai ||

Mujhe Mehtaab ka dekar Bhulava |
Tumhi ko vo dikhana chahta hai ||

Kisi ne baag ,jangal sab ujaade |
Shazar koi bachaana chahta hai ||

NahiN kuhra tiri kismat ye ‘poonam’|
'Kamar' ab jagmagaana chahta hai ||............... poonam matia

रेशम के नाज़ुक धागे में बंधा पवित्र स्नेह-दुलार..


पावन पर्व राखी का 
देता ये भीगा सा अहसास
भाई-बहिन का यह रिश्ता
देखो है कितना खास

रेशम के नाज़ुक धागे में
बंधा पवित्र स्नेह-दुलार
यही है इस पावन पर्व का
गरिमा-पूर्ण मनुहार

लक्ष्मी ने बाँधी थी राखी
बाली की कलाई
बदले में मांग ली थी
विष्णु की रिहाई

तब से अब तक बहनों ने
भाई संग प्रीति निभाई
जब-२ बाँधी डोर रेशम की
भाई ने रक्षा कर कसम निभाई


बढ़ी दूरियां, बदला माहोल
राखी की गरिमा में हुआ है ह्यास
रह गयी डोरी प्रेम की
सिर्फ एक औपचारिकता आज

बहिन सोचे राखी के धागे में
जड़ दूँ मोती, हीरे हज़ार
भाई सोचे क्यूँ है डाले
बहना मेरे सिर पे ये भार

आज रेशम की ये डोर
करती सबसे इक गुहार
सींचो इस रिश्ता को
रख दिल में प्यार-२ बस प्यार......... poonam 

Thursday, August 15, 2013

मातृभूमि तूने दिया बहुत ,जांबाज़ तूने किया बहुत 


मैं भी अक्षम नहीं किन्तु हाथ बंधे हैं मेरे 


है इल्तेज़ा यही मेरे परवरदिगार तुझसे 

काट बेड़ियाँ,खोल खिड़कियाँ हैं मेरे सामने हैं काज बहुत ..... Poonam matia



Matribhumi aur shaheedoN ko naman 

सन 1947 में जो हमें मिली क्या वो आजादी थी ....सभी जानते हैं कि वो स्वतंत्रता नहीं बल्कि एक समझोता /एक संधि थी जिसमे एक हाथ से शक्ति से दुसरे हाथ में गयी थी .इसलिए ही हम अब तक सही मायने में स्वतंत्रता का फल पा नहीं पायें हैं ......बुराइयां भी आज के समय में बहुत हैं ..........परन्तु स्वतंत्रता दिवस के अवसर पे थोडा आत्मचिंतन ज़रूरी है ....कि क्या हमें सही मायने में इसे पाया है ..गर आप सोचते हैं हाँ ....तो ठीक .........गर समझते हैं कि नहीं .......तो यह और जरूरी हो जाता है ..क्योंकि हमारे नीति निर्माताओं ने देश भक्ति के लिए केवल कुछ ही दिन मार्क कर दिए हैं तो हमें उन्हें व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए .और अपने दिल की गहराइयों से आजादी के दिन के यादगार दिवस को मनाये ताकि देश भक्ति के कुछ भाव दिलों से निकल बाहर आयें और हर एक शख्स कुछ योगदान दे पाए, .स्वेच्छा से ...अपनी जननी जन्म भूमि के लिए कुछ कर पाए .. ........
जय भारत ,वन्दे मातरम ......... धन्यवाद एवं शुभकामनाएं

Friday, August 9, 2013

Teej kii hardik badhaiyaan .....................


सावन का आया है सुहावना माह 
मयूर बन झूमने की उठी है चाह 

ज्यूँ कृष्ण संग रास रचावें गोपियाँ 
त्यूँ बदरा करे अम्बर में अटखेलियाँ

मनोहारी ‘कुमारी’ छाई है छटा 
सौंधी है माटी , बावरी हुई जाए घटा

पुष्प हैं सुगन्धित , पवन है आनंदित
‘तीज’ उड़त, हिय रोम-रोम आह्लादित

चहु ओर पींग बढावें सु-कुमार
ललनाएं झूलन को चली कर सोलह-सिंगार

मनिहारिन सतरंगी चूड़ी ले इत-उत फेरा लगावे
गोरी कलइयां थामन कृष्ण खुद झुला झुलावन आवें

मन-भ्रमर कहीं भी चैन न पावे
तीज मनाने छोरी पिया मिलन ही चहावे

सांवरिया संग मन पंछी गगन चूम-चूम आवे
कजरी, मल्हार सावन की भीनी-भीनी फुहार सुनावे

बरसों बरस यूँही भारतीय संस्कृति परवान चढती जावे
तीज-त्यौहार ,लोक-परम्पराएं सब मिलके चाव से निभावें ....... poonam matia 

Friday, August 2, 2013

मेरी नज़्म .......वोमेन एक्सप्रेस में .....

बाहर भी बारिश है भीतर नमी सी है 
शायद तुम्हारी ही कुछ-कुछ कमी सी है 

यादों का सैलाब क्यों फिर से उमड़ा है 
ख़ाबों का इक बाग़ क्यों फिर से उजड़ा है 

मुमकिन नहीं नींद आँखों को छू जाए 
ख़ाबीदा नग़मों में तू मुझको गा पाए 

शायद ये तेरी ही आँखों का पानी है 
बारिश की बूँदों में तेरी कहानी है 

क़िस्सा ये सुनने को दुनिया थमी सी है 
बाहर भी बारिश है भीतर नमी सी है
...........................................पूनम 

Monday, July 22, 2013

पिसती जनता पीसे नेता बढती रहे नेता की शान.................





देश कहा जाता है महान 
चाहे हो जनता लहूलुहान 

नेता कुर्सी नाही छोड़े 
चाहे जनता खींचे कान 

महंगाई सर चढ़ के बोले
नेता बैठे तब भी सीना तान

घोटालों की चली है रेल
'कर' की मार पड़ी है आन

झगड़े ,हमला, आतंक भारी
क़ानूनी दांव पेंच रहे छाता तान

पिसती जनता पीसे नेता
बढती रहे नेता की शान

हिन्दू -मुस्लिम न जाने भेद
फिर भी बटता रहे हिन्दुस्तान ..........................................पूनम माटिया 
गुरु कहीं भी ,कोई भी हो सकता है जिससे हम कुछ सीखते हैं या ज्ञान प्राप्त करते हैं ..........वह एक बालक भी हो सकता है .......एक वृद्ध भी .......एक वृक्ष भी हो सकता है .....और एक पत्थर भी ............शिव भी ........और शैव भी ....... विष्णु भी .........और वैष्णव भी .......माता भी ..........और पिता भी .......अध्यापक भी .........और एक शिष्य भी ......एक जड़ पर्वत भी .....और यायावर राहगीर भी ....अर्थार्त .....जो ज्ञान की वृष्टि /वर्षा करे .वही गुरु है ..........और उसके प्रति हमें अपने मन में श्रद्धा ,आदर और कृतज्ञता के भावधारण करने चाहियें ........तभी ज्ञान-उपार्जन की सफ़लता है ........गुरुवे: नमः ........बधाई सभी को गुरु पूनो की ..और मेरा हार्दिक आभार उन सभी को जिनसे मैंने आज तक कुछ भी सीखा ................
Guru kahin bhi koi bhi ho sakta hai Jisse ham kuchh seekhte hain ya gyaan prapt karte hain .........vo ek baalak bhi ho sakta hai .......aur ek vriddh bhi ............ek vriksh bhi ho sakta hai ......... aur ek patthar bhi ....... Shiv bhi ..........aur shaiv bhi ....... Vishnu bhi ...........vaishnav bhi ........ mata bhi aur .......pita bhi ....... adhyapak bhi .....aur Shi


shya bhi.......... ek jad parvat bhi ........aur ek chalta raahgeer bhi .................. artharth .......... jo gyaan kii vrishti kare ....Vahi Guru hai .... uske prati shradhha ,aadar aur kritagyata ke bhaav man mei dharan karne chahiyen ......tabhi gyaan -uparjan kii safalta hai ............. Guruve Nam:........ badhaai sabhi ko Guru pUno ki ......aur Mera hardik abhaar un sabhi ko Jinse maine aaj tak Kuchh bhi seekha hai ................. Poonam matia

अनाथ बुढापा ..............

बूढ़े मां-बाप को अकेला छोड़ देना एक ज्वलंत समस्या है। पाश्चात्य देशों की नक़ल और सामाजिक मूल्यों की कमी हमें स्वार्थी बनाती जा रही है। हर कोई आगे की ओर ही देखना चाहता है। अपने बच्चों के प्रति तो अपना कर्तव्य सभी समझते हैं, पर मां-बाप, जिन्होंने जन्म दिया, उन्हें ना जाने क्यों अचानक बोझसमझने लगते हैं।

ऐसा लगता है कि जैसे भूतकाल को देखना हमें पसंद नहीं क्योंकि जो गुजर गया, वो गुजर गया। अब सभी ‘उगते सूरज को सलाम’ वाली कहावत जिंदगी में भी अपनाने करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए जो बुढ़ा हो गया, जो अब आर्थिक रूप से घर-परिवार में कोई योगदान नहीं दे सकते, उन्हें दूर कर दिया और जो आगे आर्थिक रूप से सहयोग देने वाले हैं, उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया। ठीक वैसे ही, जैसे बलि से पहले बकरे को फूल-माला पहनाई जाती है। लेकिन, माला पहनाते वक्त यह भूल जाते हैं कि जब बच्चे आर्थिक रूप में सहयोग देने लायक होंगे, तब तक खुद वो आर्थिक रूप से बेकार हो चुके होंगे और उनके बच्चे उनके साथ ठीक वही करेंगे, जो वो देख रहे हैं। आखिर बच्चे घर से ही सब सीखते हैं और मां-बाप उसके सबसे पहले शिक्षक होते हैं, इसलिए उनकी बात वो कभी हल्‍के में नहीं लेते, जबतक खुद उसकी सोचने-समझने की शक्ति नहीं आ जाती।

हम इस समस्या को कुछ इस तरह से समझ सकते हैं कि जिस प्रकार कामकाजी माता-पिता बच्चों को क्रेच में बेखटके छोड़ने लगे हैं, उसी प्रकार बेटा-बहू बूढ़े मां-बाप को अकेले या ओल्ड एज होम या वृदाश्रम में छोड़ने में कुछ बुराई नहीं मानते, जबकि बुढ़ापा उम्र का वो पड़ाव हैं, जहां परिवार के सहारे और साथ की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। अकेले रहने वाले बड़ी उम्र के लोगों की सुरक्षा खतरे में होती है। शहरों में उनकी बढती हत्याएं इसका जीता-जागता उदहारण है। हम सभी को इन विषयों पर विचार कर सही दिशा में बढ़ना चाहिए।

हम यह क्यों भूल जाते हैं कि जैसे बच्चों को जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए बडों के सहारे की जरूरत होती हैं। इसमें जितने ज्यादा लोग और हर उम्र के लोग बच्चों को सिखाते हैं, बच्चे उतने ही ज्यादा दुनिया को समझने लगते हैं और दुनिया की समस्याओं का सामना करने में उतने ही ज्यादा सक्षम बनते हैं। उसी तरह परिवार के बूढ़े लोगों को भी बच्चों और युवाओं के साथ की जरूरत होती है। वैसे भी यह तो सिर्फ एक मानसिक अवस्था है, इससे शरीर का क्या लेना-देना? वास्तव में है क्या बुढ़ापा? जब कोई शरीर और मन दोनों से थक जाए और उसके बाद उसे लगे कि वो दुबारा वही ताजगी नहीं पा सकता... न मानसिक स्तर पर न ही शारीरिक स्तर पर... तो वो अवस्था ही बुढ़ापा है। अगर इसमें देखे, तो शारीरिक स्थिति तो समय के साथ-साथ बदलती रहती है और गिरती रहती है, थकावट बढ़ती रहती है, पर मानसिक स्तर को हमेशा थकावट से दूर रखा जा सकता है, बस अगर शारीरिक स्थिति उसे मजबूर न करे। मेरा मतलब बीमारी आदि से है। तो, फिर जब शरीर ही थक सकता है, तो बुढ़ापा कैसा! इसलिए, मानसिक स्तर पर आप हमेशा तरो-ताज़ा रह सकते हैं।

बस जरूरत है... आप अपने मस्तिष्क को कुछ नया करते रहने दें... जो उसे अच्छा लगता है, वो करने दे... हो सकता है कि चुस्ती-फुर्ती में उम्र की वजह से थोड़ी कमी आती जाए, पर बिना झिझक, बिना हिचक और बिना किसी शर्म के कि आप कितने बड़े है... कुछ नया करने का जज्बा या जो पसंद है, वो करने का जज्बा, जैसे- पतंग उड़ाना, गप्पे मारना या शैतानी करना आदि-जारी रखें। हम सभी को यह समझना होगा कि यह तभी संभव है, जब बड़े-बूढ़े परिवार के बीच रहे और अकेला ना महसूस करें........पूनम माटिया 
 — 

Tuesday, July 9, 2013

ताकतवर हो नींव..........



बूँद बूँद सागर भरे
तिनका तिनका नीड़ 
पाथर में पाथर जुड़े 
ताकतवर हो नींव

कलिकाल विकराल हो
उसका रूप अधीर 
बढ़ते जाएँ दुष्कर्म जो
सुरसरी कैसे थामे नीर

उसकी शक्ति अपार है 
जाने हर कोई जीव 
रक्षा करे हर काल में 
गर पुण्य जायें जीत 

जड़ चेतन सब में बसे 
है अंश उसी का जीव 
फ़तेह करने निकल पड़ा 
फिर भी उठा शमशीर

बढ़ते बढ़ते बढ़ गयी 
हुआ प्यास से अधीर 
भरे पेट भी आसानी से 
दूजे की रोटी लेता छीन

बस इतना ही चाहिए 
चलता चले रणवीर 
किन्तु संरक्षण प्रकृति का 
रखता चले उर बीच

जितनी भी रचना करे 
नभ धरती समंदर बीच 
शोभित करे वक्ष स्थल 

न घाव करे गंभीर.................... पूनम माटिया

Tuesday, June 18, 2013

फेसबुक के बेताज सरताज ........


दिन ब दिन यहाँ (फेसबुक पे ) 
नए नए बोस नज़र आने लगे हैं

नवांकुर हो या बरगद विशाल  
बस अपनी ही चलाने लगे हैं 

अंतर में झाँकने की फुर्सत नहीं  
दूसरों को शीशा दिखाने लगे हैं  

दिल नाम की चिड़िया रखते नहीं  
दिमाग से बन्दूक चलाने लगे है 

आत्म तुष्टि जरूरी है माना  
क्यूँ दूसरों पे ऊँगली उठाने लगे हैं  

धरती है विशाल ,वृहद् है आकाश  
क्यूँ अपनी ही परिधि बनाने लगे हैं  

समय बदलता है रहता नहीं स्थिर  
क्यूँ इस तत्थ्य को भुलाने लगे हैं  

प्रश्न उठाने लगें तो हैं अंतहीन  
क्यूँ बेवजह सर खुजाने लगे हैं ............poonam matia

Saturday, May 18, 2013

सिमटता आकाश ...............


बड़ी सी बचपन की छत 
दूर तक फैला था गगन 
बादलों में बनती बिगडती 
आकृतियों संग जुड़े थे स्वप्न

आज बंद, 
चौकोर सा कमरा 
कमरे की छोटी सी छत 
बस उतने में ही सिमटी 
रह गयी अब हर हकीकत

अनन्त, बिन कोने का 
गोलाकार आकाश था कैनवस
ज़माने के बदले रंग ढंग 
कैनवस में भी आ गई सिकुडन

चकरी की भाँति 
अपनी ही धुरी पे घूमता 
छत से लटका पंखा 
अपना सा है लगने लगा

सोच का दायरा 
बड़ा भी लें 
तो आखिर कितना
आवाज़ टकरा के 
लौट आती है 
दीवारों से तुरंत

सिर्फ मेरा ही नहीं 
हाल है ये हर उस शख्स का 
जिसने देखी होगी कभी 
तारों की अनंत दीपशिखा 
अपनी ही मुठ्ठी में 
कैद करने की संजोई होगी चाह

भागम -भाग, छुपन -छुपाई
खेल-२ में चढ़ाई होगी श्वास
बिस्तर पे लेटते ही 
नानी-दादी से सुने होंगे किस्से 
और बातों बातों में नींद 
ले लेती होगी आगोश में

आज नींद रहती कोसों दूर 
कूलर ,ए सी भी अक्षम 
शरीर खुद को लगे है बोझ 
न खेलने में, न काम में सक्षम

केवल बिजली सी रफ़्तार
और दौड़ रहा है दिमाग 
न चैन-ओ-करार 
न पल भर को आराम 
बस बंद हैं कमरे 
और सपनो को लगी लगाम...................... पूनम 

Sunday, May 12, 2013

मातृशक्ति को नमन ........मातृत्व दिवस के उपलक्ष्य में ....




औरत को जब-जब मिले माँ का स्वरुप

नतमस्तक हो जाये नर, दानव-औ-देवदूत

हर क्षण माता-पिता के प्रति आदर-सम्मान और सेवा भाव के लिए है परन्तु किसी दिवस को हम विशेष बना देते हैं जब हम माता या पिता को केंद्र में रख कर मनाते हैं ....

कभी सोचा कि एक रचना रची जाए, कभी लगा कि आप से बात करी जाए ...’माँ’ ..एक ऐसा शब्द है जिसमे संसार बसा है तो लगा कि एक रचना में कैसे समाएगा यह अनंत स्नेह-सिक्त सागर ...और ऐसा भी नहीं कि माँ के बारे में लिखने वाली मैं पहली होउंगी .....साहित्य में माँ के नाम के परचम सबसे ऊपर लहराते हैं ...कोई भी विधा हो-कहानी ,कविता ,ग़ज़ल -सभी में माँ को शिरोमणि का दर्जा दिया गया है .....सूर्योदय से चंद्रोदय तक माँ चक्रघन्नी की तरह पूरे घर में दृष्टिगोचर होती है ......पति ,बच्चे ,बड़े-बूढ़े –परिवार का कोई भी सदस्य हो ..माँ के ध्यान से छूट जाए ....ऐसा हो नहीं सकता ......इसी प्रकार ..देश दुनिया का कोई भी साहित्यकार ‘माँ’ पर लिखने से अछूता रहा हो ......ऐसा मुझे नहीं लगता |
आज जब मैं कभी भी पीछे मुड के देखती हूँ  तो मन में अपनी माँ के लिए श्रद्धा का ऐसा ज्वार आता है जो अश्रु रूप में नैनों से बहने लगता है और अनेकों-अनेक धन्यवाद देता है यह मन उनके निस्वार्थ भाव से किये गए हमारे लालन पालन के लिए .......हमें वो बनाने के लिए  जो आज हम हैं |
ज़हनी तौर पे जो तस्वीर बसी है मेरी माँ की ......वो शर्तीय किसी और ने नहीं देखी होगी ...और आज मैं उसी चित्र के कुछ रंग आप से साझा करना चाहती हूँ .....वैसे तो हम पांच भाई बहिन हैं ......पर हर एक ने कुछ खास चित्र अंकित किये होंगे अपने मस्तिष्क-पटल पे|
मुझे तो मेरी माँ ,जिन्हें हमेशा से मैंने मम्मी कहा है, उसी पवित्र रूप में याद आती हैं ......सुबह सवेरे उठकर नहा-धोकर, खुले, घुंगराले केशों को अपनी सूती धोती के पल्लू से ढकती हुई मम्मी रसोई में सारे बर्तन खाली कर दुबारा से पानी से भरती थी ..उनकी दिनचर्या का आज भी यह महत्वपूर्ण भाग है .....बालों को दोनों कानो से थोडा सा उठाकर एक पतली सी गुथ में बांध लेती थी .....एक नयी दुल्हन सी सुंदर लगती थी मेरी मम्मी मुझे ...माथे पे लाल बिंदिया गोर रंग पे बहुत निखर के आती थी ....आज मेरी मम्मी की त्वचा झुरियों से भर गयी है .शरीर भी सिकुड़ कर छोटा सा रह गया  है .....मेरे काँधे तक आने वाली मेरी मम्मी अब उतनी स-शक्त नहीं रही जितना मैं उन्हें अपने बचपन से  देखती आई हूँ| .

शायद हर माँ ही .........हाँ ‘मैं’ भी ...एक अजीब सी दैवीय शक्ति से भरपूर होती है  जो उसे भगवान के जैसी ही सर्वज्ञ, सजग  और सम्पूर्ण बना देती है ....पूजा करती हुई मेरी मम्मी को देखकर मुझे लगता था कि शायद मम्मी अपने लिए कुछ मांगती ही नहीं ........ बच्चों की ख़ुशी के लिए सर्वस्व  न्योछावर करने की इच्छा शायद सबसे अधिक माँ में ही होती है  जो एक चाबी सी भर देती है माँ के शरीर में .....वैसे तो हर बालक को अपनी माँ के हाथ का बना खाना सबसे स्वादिष्ट लगता है .....पर यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी जब मैं कहूँगी कि मेरी मम्मी के हाथ का बना खाना खाने के बाद कोई भी उंगलियाँ चाटे बिना नहीं रह सकता |

एक अनोखा गुण जो मैंने बहुत कम लोगों में देखा है .....वो यह कि मम्मी  मार्किट में भी सिर्फ खरीदारी नहीं कर के आती थी वह तो दिमाग भी भर लाती थी नए नए विचारों से .....और घर आकर उन्हें हमारे कपड़ों ...मेरे लिए फ्राक .दीदी के लिए सूट ..भाइयों के लिए शर्ट, नेकर .....पापा के लिए कुर्ते-पजामे ...और अपने खुद के ब्लाउज़  में बखूबी ढाल देती थी ....वो क्षण अविस्मरनीय होते थे जब उनकी आँखे चमक जाती थी ......उन कपड़ों में हमें सजे संवरे देख के |

घर में आने वाले मित्र ,रिश्तेदार ,अड़ोसी-पडोसी  कोई भी ऐसा नहीं होगा जिसने उनकी कर्तव्य निष्ठा पर पुष्प समान शब्दों की वर्षा न की होगी ........मेरे बच्चे भी नानी के सामने मुझे गौण ही कर देते हैं और सही भी है ...उनकी छाया हैं हम...कितने भी बड़े ,संपन्न हो जाए .....उनके रोशन तेज के समक्ष कुछ नहीं |

औपचारिक शिक्षा तो विद्यालय ,कालेज इत्यादि में मिलती है सभी को .....परन्तु माँ तो अनुभव का वो पूर्ण संसार है जो चलता–फिरता गुरुकुल है परिवार के सभी सदस्यों के लिए| उनके द्वारा पुराने रीति-रिवाजों को निभाते हुए सभ्यता और संस्कृति का हस्तांतरण करना (जैसे कि मम्मी का गोबर से गोवर्धन और दशहरा बनाना और दीपावली पर खड़िया से हटड़ी को लीपना).., .....बच्चों के संग बच्चा बन कार्टून फिल्म की बाते करना , बातो-बातों में गिनती, पहाड़े , नर्सरी-राइम्स याद करवा देना ,........बहुओं-बेटियों  के संग टी. वी. धारावाहिक के किरदारों की चर्चा करना और सम –सामयिक विषयों जैसे समाज में फैली विकृतियों -सामूहिक रेप , भ्रष्टाचार इत्यादि पर अपनी बेबाक राय रखना तथा काम करते-२ आजकल के ज़रूरी अंग यानी मोबाइल और कंप्यूटर का सफल उपयोग करना.......अपने समकक्ष लोगों के साथ ग्रंथों में निहित ज्ञान पर तर्क-वितर्क करना ......साबित करता है .......

परिवार को जोड़े रखने का मज़बूत आधार.......माँ स्वयं ही  एक सम्पूर्ण संसार |
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