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Saturday, December 29, 2012

प्रतिदिन के सब काम हो रहे हैं यथावत.....
परन्तु दिल है व्यथित ..
''दामिनी ''
ने विदेश में अपनों से बहुत दूर इस निर्दयी दुनिया को त्याग दिया है ....
एक पाली -पनोसी........ तेईस साल ...... डाक्टर बेटी........को खोना क्या और कैसा होता है .हर माँ 
बाप समझ सकता है ......
परन्तु देश के
'सदर' को अब अनुशासन की चिंता है
.कानून का इस्तेमाल कर दिल्ली में पोलिस की नाकाबंदी की गयी है ...
ये व्यवस्था
आम इंसान की सुरक्षा के लिए तब क्यूँ नहीं की जाती ....जब उसका दिल शंकित और असंतुष्ट रहता है 

जब तक के बच्चे (खासकर बेटियाँ) स्कूल /कॉलेज /नौकरी से सुरक्षित वापस न आ जाये .......
क्यूँ बलिदान देना पडा उस बच्ची को देश को जगाने को ..
क्यूँ ये जाग्रति हर बार बलिदान मांगती है ......
प्रश्न चिन्ह लगाती है ये 
भारतीय सभ्यता और परम्पराओं की दुहाई देने वाले 
सियासत दारों के पाषाण रवैये पर ..................
शब्द भी चीत्कार करते हैं 
जब उस मासूम का चेहरा ज़हन में लाने की कोशिश की जाती है 
जैसे कह रही हो अब भी ''मै जीना चाहती थी ''...........................पूनम 

Thursday, December 20, 2012

एक आवाज़ उठेगी तो सौ संग में जुड़ जाएँगी.........


देश की राजधानी में एक लड़की की अस्मत दागदार ,तार तार हुई है .......ऐसे में कोई कैसे हंस सकता है ........सभी को अपनी शक्ति के अनुसार इस घटना का विरोध करना चाहिए और खासकर एक लेखक और कवी को अपने शब्दों के माध्यम से अपना योगदान देना चाहिए ........



दिल पे अघात हुआ है 
अबला पे अत्याचार  हुआ है 

सियासतदारों की नाक के नीचे 
रक्षा के लिए प्रतिबद्ध 
संविधानी तौर पे कटिबद्ध 
पुलिसकर्मियों की खुली आँखों के सामने 
जन सुविधाओं के चालकों ने 
देश की अस्मत पर कुठाराघात किया है 

ऐसे में हम कैसे रहे शांत 
कैसे न उठाये आवाज़ 
क़ानून को ललकारना होगा 
घ्रणित ,विक्षिप्त मानसिकता को 
जड़ से उखाड़ना होगा 

एक आवाज़ उठेगी तो 
सौ संग में जुड़ जाएँगी 
शायद सरकार के कान पे 
जूँ कोई रेंग जायेगी 

एक आवाज़ उठेगी तो 
सौ संग में जुड़ जाएँगी 
शायद सरकार के कान पे 
जूँ कोई रेंग जायेगी .................................पूनम.

Thursday, December 13, 2012

Baadal..........बादल......



बरखा रानी का जन्म दाता ....


अपने कोष में समेटे है धरती का अमृत


वो जो लेता है स्वरुप हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप


वो रखता है क्षमता सूर्य को ढापने की


वो जो फैलाता है माँ सम आँचल तेज 


धुप में


वही जो दिखता है क्षितिज के छोर तक


मुलायम है,सफ़ेद है कभी कोमल रूई सा


सख्त लगता है कभी स्याह कोयले सा


वो जिसे देख नाचे जंगल का मोर


वो जिसे देख खिल उठे मन का भी मोर


वो बदलता है नित नए रूप


कभी नयी वधु सा उदीप्त ,तेजोमय


कभी उदास ,मुरझाई विरह में प्रेमिका


वो जो चंचलता में नहीं कम किसी हिरनी से


वो जिसकी चपलता का चर्चा नहीं कम किसी तरुणी से


वो जो अल्हड सा घुमे चिंता विहीन नवयोवना सा


कभी हाथ में आए ,कभी फिसल जाए


कभी क़दमों में ज़न्नत सजा जाए


वो निराकार ,कभी साकार मेरे सपनो का बादल


अपने कोष में समेटे है पृथ्वी का निर्मल जल ........पूनम

Monday, December 10, 2012

किधर जा रहें हैं .............क्या खो रहें हैं हम ..............



प्रकृति से दूर हो रहें हैं हम
काफी कुछ खो रहे हैं हम


अपनों की बात क्या करें
खुद से भी दूर हो रहे हैं हम


सृजन तो हो रहा है अब भी
सुकून दिल का खो रहे हैं हम


दूर की आवाज़ सुन लेते है
मौन अंतर में बो रहे हैं हम


विश्व को परिवार बनाने चले
निज नाते रिश्ते खो रहे हैं हम


जानते बूझते मूक बधिर बने
इस जिंदगी को ढो रहे हैं हम .......................पूनम

Thursday, November 29, 2012

कजरारे नयन तुम्हारे 

करे मेघ भी कारे

मुझ भ्रमर मन को चैन कहाँ 


उडत फिरत हूँ 



रस को तिहारे




इत-उत निहारूं
,


चित किंचित अकुलाए 


पल भर को पलक झपकाओ ,


प्रिय 


मोर मन धीर कहीं तो पाए ..........Poonam 

Saturday, November 17, 2012

छट का पावन पर्व



भोर की भई है बेला

नहीं तिमिर का कहीं चिन्ह

सूर्य का साम्राज्य चहू –ओर 

नदिया का पावन तीर


दीया-बाती,


मोहक महक अगरबत्ती की 


पावन-पर्व , श्रद्धा-सुमन


कर–जोड़े, पुलकित मन


सज-धज कर करें


अर्पित हम पुष्प और नीर


छटा यह  न्यारी


निहारे बच्चे ,पुरुष और नारी .........पूनम (स्वप्न शृंगार)

Tuesday, November 13, 2012

माँ लक्ष्मी का वरद हस्त हम पर मेहरबान हो ..

इस दीपावली सदविचारों का संचार हो 
कलह-क्लेश का शमन शांति स्नेह का प्रसार हो 
वाणी कर्म और बुद्धि पर सरस्वती का वास हो 
माँ लक्ष्मी का वरद हस्त हम पर मेहरबान हो 

लक्ष्मी चंचला ,स्थान एक ठहरती नहीं
मूढ़, अज्ञानी मानव की चाहे कभी भरती नहीं
सांसारिक माया ,इंसा की झोली कभी भरती नहीं
गुज़ारिश भगवान से ,संतुष्टि का हमें वरदान हो

राम जी की अयोध्या वापसी खुशियाँ ले आती हैं
हर वर्ष लक्ष्मी पूजन को घर-दुकाने सज जाती हैं
पर महंगाई की मार गरीब की खुशियाँ छीन ले जाती है
दीपोत्सव पर गम की लकीरें मिटें ऐसा कुछ अनुदान हो

प्रदूषण का दानव रहा है बाहें पसार
वातावरण में विष का हो रहा है संचार
माटी ,जल, वायु कुछ नहीं स्वच्छ देने को उपहार
छोड़े नहीं पटाखे तो अग्नि,जल, पवन देव मेहरबान हों


माँ लक्ष्मी का वरद हस्त हम पर मेहरबान हो ................. ...........पूनम .

आओ मिलकर मिटटी के दीप जलायें
अपना जहाँ जगमगाएं ,दीपावली मनाएं

मंगल गाले , दीपों की अवली सजाले आवो मंदिर में माँ लक्ष्मी को बिठालें.

शुभ दीपावली 
.................
मंगल गाले , दीपों की अवली सजाले
आवो मंदिर में माँ लक्ष्मी को बिठालें


लक्ष्मी जी बिराजे कमल सिंहासन
मुख मंडल पर किरणों का आसन
सुंदर सुजल तुम्हारे दोउ नयना
स्वर्ण मुकुट ,चमके पायल हर गहना
थिरके मंद-मंद मुस्कान अधर तिहारे
स्वर्ण मुद्रा छलकत हस्त पखारे
आ बैठों भगवान् गणेश के सहारे
माँ लक्ष्मी हम तिहारो पंथ निहारे

मंगल गाले , दीपों की अवली सजाले
आवो मंदिर में माँ लक्ष्मी को बिठालें

पदम विराजे, गज सवारी तुमने किन्ही
भक्तन की सब विपदा हर लीन्ही
मुझ गरीब की कुटिया पधारो
आवो माँ मेरा भाग्य सवारों
हृदय सिंहासन पर आ बैठो मात
त्तोहे से करले कछु दिल की बात
जय जय महालक्ष्मी करे भक्त पुकार
जय जय महालक्ष्मी सुनलो हमरी गुहार

मंगल गाले , दीपों की अवली सजाले
आवो मंदिर में माँ लक्ष्मी को बिठालें....................पूनम 

Friday, November 9, 2012

इन्तेज़ार ......





तमन्नाये कहें या ख्वाइशें मेरी अभी हैं बाकी || 

गेसुओं की छाँव में उम्र बिताना अभी है बाकी||




छोड़ दे जिद्द बस आजा एक बार सिर्फ मेरे लिए|


एक उम्र से तरसा हूँ तिश्नगी बहुत अभी हैं बाकी|| 





कशिश तेरी खींच लाती है मुझे बज़्म में तेरी |


दीदार-ए-यार की तड़प दीवानगी अभी है बाकी|| 




हैरत है के जिन्दा हूँ तन्हाइयों ,खामोशियों में भी| 


कुछ तुझे सुनना,कुछ तुझे सुनाना अभी है बाकी || 





अब के आना 'पूनम' तो रूठ जाना बेशक |

के तेरा रूठना ,मेरा मनाना अभी है बाकी ||......................poonam

Monday, October 29, 2012

इंसान को इंसान समझना..........



मित्रों यह रचना मैंने ''अपना घर ,भरतपुर '' के प्रयासों के प्रति समर्पित की .....

मूर्ती पूजते हैं हम
मूर्तिकार को भूल जाते हैं

कहने को भगवान सब में है
कहते हैं हम
पर उसे इंसानों में
देखना भूल जाते हैं

जो खाता नहीं
उसे छप्पन भोग लगाते हैं
दूजे का खाली पेट
नज़र अंदाज़ कर जाते हैं

मंदिर मस्जिद को सजाते हैं
नक्काशी करवाते हैं
एक एक नक्श
उसकी बारिकियाँ
सब पर निगाह रखते हैं
जीवित इंसान के
शरीर पर खरोंचें ,ज़ख्म हैं कितने
उन पर एक प्यार भरी
निगाह डालना भूल जाते हैं

मुश्किल नहीं किसी का पेट भरना
पर अपने से ध्यान
हटाना भूल जाते हैं

खुदा बसता खुदा के बन्दों में
बस यही याद रखना है
एक स्नेह स्निग्ध साथ
एक मदद भरा हाथ
बढ़ाना है ज़रुरी
गिरे हुए को उठाना
ज़ख्मो को सहलाना
कूड़ा करकट ,कीड़ा मकोड़ा नहीं
इंसान को इंसान समझना
चलो एक बार यही
करके दिखाते हैं
चलो एक बार यही 
करके दिखाते हैं.........पूनम (अप्रकाशित)

''अपना घर ''एक सेवा सदन है जहाँ असहाय ,पीड़ित ,वेदनादायक स्तिथि में पाए जाने वाले लोग, जिनका कोई नहीं होता ,उन्हें इलाज़ और रहन सहन की सुविधा मिलती है .........इसका प्रमुख कार्य क्षेत्र ,भरत पुर राजस्थान में है .....और इसके अलावा कोटा ,अलवर  में भी है ......आज (28/10/12)  दिल्ली में भी इसका लोकार्पण हुआ ........



Sunday, October 28, 2012

फिर से ...



स्वप्न सजाये हैं इन आँखों ने आज फिर से
उसकी सूरत उभर आई है ज़हन में आज फिर से

इक अहसास .इक सिसकती याद ने ली अंगडाई है फिर से
उसके लबों की मासूमियत ने धडकन बढ़ाई है फिर से

प्यार की बूंदे आज मेघों ने टपकाई हैं फिर से
दामन में मेरे सौंधी सी महक जैसे भर आई है फिर से

बाजुओं में आज उसके समा जाने की चाह उठ आई है फिर से
आरजू-ए-मिलन ए-खुदा गहराई है आज फिर से

तेरी बंदगी में सर झुका के बैठी हूँ
अपनी रज़ा से नवाज़ दे आज फिर से.........पूनम (स्वप्न शृंगार में संकलित )

Thursday, October 11, 2012

इंसा हूँ , इंसा तो मानी जाऊं .........


सधवा से विधवा हुई 
क्या मेरा कसूर था ?
उससे भी पहले पैदा हुई 
क्या मेरा कसूर था ?
एक घर से दूजे घर भेजी गयी 
क्या मेरा कसूर था ?
जनी बिटिया मैंने 
क्या मेरा कसूर था ?
दूसरी औरत के लिए त्यागी गई 
क्या मेरा कसूर था ?
शराबी पति द्वारा पीटी गयी 
क्या मेरा कसूर था ?
गर नहीं तो 
क्यूँ डायन करार दी गयी 
क्यूँ जीवित पत्थर में चिन दी गयी 
क्यूँ सती कह जिन्दा जलाई गयी 
चाहा नहीं देवी बन पूजी जाऊं 
चाहा ये भी नहीं पाँव की जूती कहाऊं
चाह सिर्फ एक 
इंसा हूँ , इंसा तो मानी जाऊं 
इंसा हूँ,  इंसा तो मानी जाऊं............poonam ......(इ पत्रिका 'नव्या' में पूर्व प्रकाशित )

Friday, October 5, 2012

फेसबुक मैत्री सम्मलेन 29-30 सितम्बर 2012......सफल रहा ...:)


फेसबुक मैत्री सम्मलेन 29-30 सितम्बर 2012
पूनम की नज़र से 

आयोजक: ‘हम सब साथ साथ’ और ‘अपना घर’ 
स्थान : ‘अपना घर’ भरतपुर ,राजस्थान ,भारत
विशेष योगदान:किशोर श्रीवास्तव ,अशोक खत्री 

अपना घर,भरतपुर 



लगभग एक माह से फेसबुक पर इस आयोजन के होने की सूचना और इससे सम्बंधित गतिविधियों की गूँज हो रही थी जिसकी प्रतिध्वनि भारत के विभिन्न प्रान्तों से सुनी जा सकती थी|दिल्ली से ‘हम सब साथ साथ हैं पत्रिका के संपादक किशोर श्रीवास्तव एवं श्रीमती शशि श्रीवास्तव जी और बयाना से श्री अशोक खत्री जी के मार्गदर्शन में इस प्रोग्राम का आयोजन संभव हुआ|

मै और नरेश गोकुलधाम के दर्शन के बाद 


29 सितम्बर ........

मै(पूनम) और नरेश माटिया 29 सितम्बर को मथुरा में गोकुल धाम के दर्शन कर भरतपुर लगभग दोपहर 4.30 बजे पहुंचे|  
अपना घर प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य 


29 सितम्बर की सुबह से कई फेसबुक मित्रगण वहाँ आने शुरू हो गये थे जिनमे सबसे पहले पहुँचने वाले थे उज्जैन से संदीप सृजन( ‘शब्द प्रवाह’ के संपादक) और उनके बाद लेखक /कवि डाक्टर ए.कीर्तिवर्धन (मुज़फ्फरनगर), प्रसिद्द व्यंग्यकार सुभाष चन्द्र (दिल्ली ),गज़लकार ओमप्रकाश यति (नॉएडा ), डाक्टर सुधाकर आशावादी ,कवि अतुल जैन सुराना और गाफ़िल स्वामी (अलीगढ ) भी ‘अपना घर’ पहुंचे |..दिल्ली से आने वाले मित्रों में किशोर श्रीवास्तव ,शशि श्रीवास्तव के साथ संगीता शर्मा (बच्चों सहित ),ऋचा मिश्रा (दैनिक जागरण,नॉएडा ) पूनम तुशामड , सुषमा भंडारी और मानव मेहता (हरियाणा से) आये| झाँसी से नवीन शुक्ला जी और भीलवाडा, भरतपुर, बाड़मेर तथा फतहपुर सीकरी से भी कई मित्र इसमें रात तक शामिल हो गये थे| 
विशाल भवन बेसहारों का सहारा 

 पीड़ित लड़कियों से बात करते हुए 
अपना घर के लोगों से मिलने को आतुर 
‘अपना घर ‘ से जुड़े हुए अशोक खत्री जी और अपना घर के संस्थापक डाक्टर दम्पति माधुरी जी एवं बी ऍम भारद्वाज जी के सफल निर्देशन में सभी आमंत्रित मेहमानों के रहने ,खाने पीने का बंदोबस्त किया गया था |5 बजे पंजीकरण और परिचय सत्र में सबने अपना-२ परिचय दे कर दो -दिवसीय आयोजन की शुरुआत की|चाय पीकर सभी ‘अपना घर’ संस्था के भ्रमण के लिए अशोक खत्री जी के साथ निकले जहाँ जिंदगी के वीभत्स किन्तु मार्मिक रूप से रु-ब-रु हुए| बातचीत के दौरान मानसिक रूप से परेशान बालिकाओं ,महिलाओं और वृद्धो से उनके हालात के बारे में पता चला कि कैसे जिंदगी ने और उनके अपनों ने ही उन्हें छला था | ‘अपना घर’ संस्था इन अजनबी, अनजान, मुसीबतों से ग्रस्त हर आयु के लोगो को रहने, खाने-पीने और उपचार तथा व्यवसाय की सुविधायें प्रदान कर सामाजिक कार्यों में बेहतरीन योगदान कर रही है| दिल्ली से आये प्रख्यात पत्रकार एवं कवि श्री सुरेश नीरव जी के शब्दों में ‘अपना घर’ आना एक तीर्थ यात्रा के समान है | 

अपना घर भ्रमण के बाद एक विचार गोष्ठी आयोजित की गयी जिसका विषय था “मैत्री भाईचारे के प्रचार प्रसार व साहित्यिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ में फेसबुक की उपयोगिता”| उदघोषणा किशोर श्रीवास्तव जी ने की और श्री सुभाष चन्द्र जी की अध्यक्षता में लगभग सभी सदस्यों ने ( सर्वश्री कीर्तिवर्धन , पूनम तुशामड , सुधाकर आशावादी , शशि श्रीवास्तव ,गाफिल स्वामी , सुषमा भंडारी , ऋचा मिश्रा , अशोक खत्री , पूनम माटिया और रघुनाथ मिश्र जी ने अपने विचार रखे और सबने लगभग यही बात कही कि फेसबुक एक उपयोगी माध्यम साबित हो रहा है इस सन्दर्भ में | अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सुभाष जी ने कहा ‘फेसबुक तब अपनी बुलंदियों को पाता है जब उस से सरोकार जुड़े’ | अतुल जैन सुराना ने धन्यवाद ज्ञापन दिया |

विचार गोष्ठी 
रात्रि भोज के बाद गीत संगीत की महफ़िल जमी जिसमे किशोर जी ने ढोलक की थाप पर भजन और गीत प्रस्तुत किये तथा मिमिक्री से सबका मन मोह लिया |नवीन शुक्ला जी ने अपने मीठी बांसुरी की तान से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया | पूनम तुशामड , संगीता शर्मा , सुषमा भंडारी सभी ने अपने-२ स्टाइल में गीत सुनाये | सुभाष चन्द्र , ऋचा मिश्रा और कई मित्रों ने गज़ल सुनाकर महफ़िल में समा बाँधा |गाफ़िल जी ने माँ को समर्पित अपनी रचना बड़े जोर शोर से सुनाई | ढोलक की थाप ,ढपली और मजीरे की झंकार के साथ एक लोक गीत पर पूनम माटिया यानि मैने नृत्य भी किया |

30 सितम्बर 

कचोडी-आलू, जलेबी और पोहे के नाश्ते के साथ सबने किशोर श्रीवास्तव कृत “खरी-खरी” कार्टून प्रदर्शनी का भी लुत्फ़ उठाया | उस समय तक कई और फेसबुक मित्र भरतपुर पधार चुके थे जिनमे पुरुस्कृत अरविन्द ‘पथिक’, हेमलता वशिष्ठ, कृष्ण कान्त मधुर, पूनम त्यागी (दिल्ली)और अजय अज्ञात (फरीदाबाद) दिल्ली से प्रमुख हैं | प्रख्यात कवि सुरेश नीरव जी , प्रसिद्द गज़लकार साज़ देहलवी , डॉ रेखा व्यास (दिल्ली दूरदर्शन) , कवि रघुनाथ मिश्र (राजस्थान) इस आयोजन में शामिल हुए |

फतेहपुर सीकरी पर समूह तस्वीर 
सलीम चिश्ती की दरगाह 
‘अपना घर’ की ओर से आयोजित फतेहपुर सिकरी भ्रमण का लाभ 25-30 लोगो ने उठाया और तेज धूप के बावजूद सभी ने सलीम चिश्ती दरगाह और बुलंद दरवाजे का अवलोकन किया साथ ही खूब खरीदारी भी की |

नये मित्रों के साथ 
दरगाह की पौड़ी पर 

दोपहर के भोजन के उपरांत कवि सम्मलेन आयोजित किया गया जिसका सञ्चालन किशोर श्रीवास्तव और अरविन्द ‘पथिक’ ने किया |इस कवि सम्मलेन की अध्क्षता श्री सुरेश नीरव जी ने की और मंच पर उनका साथ दिया गज़लकार साज़ देहलवी जी, रघुनाथ मिश्र जी और डॉ रेखा व्यास जी तथा भारद्वाज जी और माँ माधुरी जी ने | इन महान विभूतियों के कर-कमलों द्वारा ‘हम साथ-साथ है’ पत्रिका द्वारा आयोजित मैत्री सम्मान श्री सुरेश नीरव जी को और श्रीमती पूनम माटिया को दिया गया | उसके उपरान्त विभिन्न कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया जिसको श्रोतायो ने बड़े मन लगाकर सुना और समय-२ तालियों से उनका हौसला वर्धन किया | इस दौरान सुषमा भंडारी जी का काव्य संग्रह ‘अक्सर ऐसा भी’ का विमोचन भी किया |

श्रेष्ठ जनों द्वारा पुरुस्कृत होते हुए मै 
श्री सुरेश' नीरव' जी ,श्री रघुनाथ मिश्र जी एवं हम साथ साथ हैं की संपादक श्रीमति शशि श्रीवास्तव  
कविता पाठ और ग़ज़ल गायकी का क्रम मुझसे यानि पूनम माटिया से आरंभ हुआ और उसके बाद संदीप सृजन , अतुल जय सुराना ,दीक्षित जी, अजय ‘अज्ञात’ ,पूनम तुशामद ,सुषमा भंडारी, संगीता शर्मा, ऋचा मिश्रा ,किशोर श्रीवास्तव , कृष्ण कान्त मधुर , ओम प्रकाश यति, गाफ़िल स्वामी, अशोक खत्री जी और अरविन्द ‘पथिक’ जी की  जोश से भरी गायकी तक चला | अंत में रघुनाथ मिश्र जी और साज़ देहलवी जी , रेखा व्यास जी और श्री सुरेश ‘नीरव’ जी ने अपनी भावनात्मक गज़लों से सबका मन मोह लिया | किशोर श्रीवास्तव जी ने धन्यवाद ज्ञापन देकर इस आयोजन की समाप्ति की घोषणा की |

मुझसे फिर जल्दी आने की कहते हुए :)
कार्यक्रम के अंत में ‘अपना घर’ के संस्थापक डॉ भारद्वाज दंपत्ति ने प्रतीक चिन्ह देकर आये हुए सभी मित्रों को सम्मानित किया |

विदा के पल ‘अपना घर’ के वासियों के लिए और हमारे लिए काफी भावुक थे उनकी निगाहें पूछ रही थी फिर कब मिलने आओगे ....
..........

Wednesday, September 26, 2012

एक आम इंसान कही खो रहा....



इन ऊँची -ऊँची गगन चुम्बी इमारतों में
एक आम इंसान कही खो रहा  

कभी सर ऊँचा कर चलता था
आज आस्तित्व भी धूमिल हो रहा  .

सपने उड़ान भर रहें है ऊंची 
लेकिन यथार्थ में धरातल को छू रहा 


आधुनिक समाज का सूटेड-बूटेड है पहनावा
चिंताजनक है स्तिथि, अंतर्मन जो खोखला हो रहा

रिश्तों में प्यार दिखाई दे बेशक
जरूरत के समय केवल एक दिखावा ही हो रहा  

रास्ते गाँव से शहर की तरफ आते रहे 
मगर वापस जाने का पथ धूमिल हो रहा  

इन ऊँची -ऊँची गगन चुम्बी इमारतों में
एक आम इंसान कही खो रहा  ...................पूनम(अप्रकाशित)

Sunday, September 23, 2012

निश्छल प्रेम...............


प्रेम ईश है
प्रेम भक्त है 
प्रेम में जीवन 
प्रेम बिन तन निष्प्राण 
प्रेम ही संगीत 
प्रेम ही मधुर गान
सुमधुर झंकार से झंकृत 
कर्ण-प्रिय और 
नैनों की ज्योति है प्रेम
अधरों पर मुस्कान 
सुगन्धित पवन है प्रेम 
ये धरती प्रेम-मय 
व्योम में भी व्याप्त है प्रेम 
धुरी पर ज्यूँ घूमे धरा 
त्यों ही झूमे दिल प्रेम -भरा 
मीरा है प्रेम 
राधा है प्रेम 
कबीर के दोहे 
कालिदास का काव्य है प्रेम 
निश्छल चन्द्र किरणों सा 
तेजोमय दिनकर सा 
हर प्राणी का 
तात और मात है प्रेम ............पूनम .......



Tuesday, September 11, 2012

आज़माइश.........


pic courtsey.....Bharat Patel 




. 
हर पल आज़माइश के क़गार पर ही ख़ुद को खडा पाते हैं
एक इम्तिहान से उभर नहीं पाते हैं हम अभी
सामने एक नयी समस्या से फिर जूझते नज़र आते हैं

जीना पड़ता है ‘आज’ में हर किसी को
पर इस ‘आज ‘ को हरदम ‘कल’ की गिरफ़्त में ही पाते हैं

खुशियों का रेला लगा हो चारों ओर बेशक
दुखों का भँवर घेर लेगा कब
इसी पशो-पेश में ही ख़ुद फंसा पाते हैं

दिल शीशे का नहीं ,काफ़ी मज़बूत है जानते हैं हम
पर इसके टूटने का ही शोक मनाते नज़र आते हैं

अच्छा नहीं इतना उदासीन रवैया, जानते हैं सभी
फिर भी दुखों में डूब कर ही क्यों ग़ज़ल उभार पाते हैं
......poonam (AR)


naye roop mei 

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Thursday, September 6, 2012

ओ! मेरे चंचल शोख मितवा


मधुर ताल, मधुर गान 
मधुर ही हैं ये अधर तोरे 
नयन तोरे धीर, गंभीर 
पर चलाये घनेरे तीर 
हृदय तरंगित हो उठता 
जब पग में बाजे पायल तोरे 
सुन मोरे चंचल, शोख मितवा 
तोरे से जगमग दिन-रैन मोरे 

कह दो दिल खोल कर.............



चाहती तो कहना बहुत कुछ थी,मगर शिकन देख
जाने क्यों थाम लिया खुद को, सी लिए लब 

सुना था कि बातों में बात बड जाती है 
यही एक बात लबों पे ताला लगा जाती है

काश कि कोई चाबी उनके दिल की मिले
तो फिर क्यूँ बड़े यूँ शिकवे-गिले

आसां हो जाये दिल तक पहुंचना
न चुप रहना, न तिल का ताड़ बनना

ग़लतफ़हमी की बेल बेलगाम होती है
अक्सर इसके फलों में कड़वाहट बसी होती है

कहते हैं लोग - कह दो दिल खोल कर
क्यूँ बाद में पछताना बातों को नाप-तोलकर

थी आँखों में नमी और दिल में तूफ़ान-ऐ-ज़ज्बात
पर रोका न खुद को ,बस कह दी अपने दिल की बात

कहते ही सिंधु समान अश्रु-सगर उमड़ पड़ा
दिल था जो भारी,हल्का हो बादल-सम उड़ चला

मुस्कुरा के देखा उन्होंने ,खोले अपने भी दिल के पाट
मेरे दिल में भी खिल उठे आज फिर सूर्ख गुलाब ........................पूनम.