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Thursday, October 15, 2015

हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था.......


मैंने देखा था,
हाँ मैंने तो देखा था
शायद ‘तुम’
सोच भी न पाओ|

वो मूंह-अँधेरे उठना,
चूल्हा लीपना, या
अंगीठी जलाना,
तड़के ही शौच निवृत हो
सबके उठने से पहले नहाना,
टोक्नियाँ, घड़े ,पतीले भरना,
मन ही मन में मंत्रोचारण,
आरतियों का बुदबुदाना|
संग-संग पूरा घर बुहारना,
रात के बचे बर्तनों को
चूल्हे की राख से माँज,
स्वयं पौंचा लगाना|



न–न मैंने नहीं किया|
बस देखा नानी ,दादी
मम्मी ,मामी, बुआ, चाची को|
चप्पल ,जूते नज़दीक न फटकने देती,
न खाने देती बिन नहाए कुछ|
काम नहीं कराती थीं,
ख़ुद ही को तो खठाती थीं|
दूध ,सब्जी-रोटी, मठ्ठा, दाल
सब मिल-मिल कर बनाती थीं|
चूल्हे की आग ठंडी होने तक
कुछ न कुछ पकाती थीं|
ठंडा हमे कहाँ खिलाती थीं,
अंत में ही तो खुद खाती थीं|

नहीं, नहीं! गुस्सा नहीं झलकता था,
पल्लू तनिक न सरकता था,
लाली-लिपिस्टिक न भी हों
पर पसीने की बूंदों संग
बिंदिया ,सिन्दूर बहुत दमकता था|
चूड़ियों ,पाजेब की खन-खन से
पूरा का पूरा घर खनकता था|
हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था|
हाँ, वो घर ‘घर’ लगता था|