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Sunday, June 2, 2019

पहली फुहार.......कहानी .....पूनम माटिया


पहली फुहार
सभी दरवाज़े बंद, आँगन में सन्नाटा-सा, केवल एक खिड़की से आती हुई ट्यूब की रौशनी। अकसर ही मेरी नज़र उस तरफ चली जाती थी, जब भी टहलते हुए कुछ देर के लिए रूकती थी मैं। एक जगह बैठ़ के कभी पढ़ने में मज़ा ही नहीं आता था। कभी कमरे में, कभी बगीचे में और कभी छत तक जाने वाली सीढ़ियों पर बैठ जाती थी अपनी किताबों और नोट्स का पुलिंदा लेकर। रजिस्टर हाथों में उठाकर घूम-घूम के रट्टा लगाती हुई जब भी मेरी निग़ाह खिड़की से बाहर जाती तो न जाने क्यूँ उस खुली खिड़की से आती हुई रौशनी को देख थम-सी जाती थी, खोजी दिमाग में प्रश्न अनेक आते थे - कौन है वहाँ ? क्या कर रहा है ? कभी देखा ही नहीं किसी को वहाँ घुसते या निकलते !
बस इन्हीं प्रश्नों के जवाब खोजती एक दिन जिद्द सवार हो गयी मुझ पर कि आज तो पता करना ही है वहाँ उस खिड़की के पार उस कमरे में कौन है जिसका मुझे कुछ अता-पता ही नहीं। मेरे हाथ की किताब अचानक धम्म से गिर गयी, जब मैंने वहाँ से एक गोरे से, लंबी कद-काठी वाले चश्मिश लड़के को सुबह छह बजे निकलते देखा। वह बिना इधर-उधर देखे अपनी ही धुन में खोया ताला लगा कर चल दिया।
आज जब यह दृश्य आँखों के सामने से गुज़र रहा है तो फिर वही खलबली-सी है दिल में और एक अजीब-सा अहसास है, ग्लानि भी है शायद ! कितनी बचकाना-सी हरकत की थी हम सहेलियों ने मिलकर। जब मैंने स्नेहा को बताया कि एक स्मार्ट-सा लड़का उस किराये के कमरे में पढ़ने आता है। सी.ए. की परीक्षाओं के लिए। सब ख़ोज ख़बर निकाल ली थी हमने अपनी सहेली टीना से जो उस घर के सामने ही रहती थी। टीना ने बताया था कि सिर्फ़ कुछ ही दिन पहले उस लड़के ने वह कमरा किराए (रेंट) पर लिया है और यह बात उसने भी अपने सोर्सेज़ (सूत्र) यूज़ (इस्तेमाल) करके निकलवाई थी किसी से।
खैर, जब पता चल ही गया तो बरबस निग़ाह उस तरफ जाने लगी। कब आता है, कब जाता है ? एक खेल या कोई प्रोजेक्ट-सा बन गया था, जैसे कि उसके ख़त्म होने के बाद दूसरे प्रोजेस्ट्स की तरह उस को ग्रेड्स मिलने वाले हों। क्यूँ न बनता ? आखिर वो इधर-उधर देखता ही नहीं था, जब कभी बाहर निकलता तो बस नज़रें नीचे किये हुए। मुझे तनिक भी स्वीकार्य नहीं था की कोई ऐसे भी लड़के होते हैं जिन्हें अपने आसपास देखने का मन न करे और सच कहूँ तो इन्सल्ट-सी फील होती थी की कैसे कोई सुगंधा यानि मुझे अनदेखा कर सकता है। मेरी सहेलियों ने चने के झाड़ पे जो चढ़ा रखा था मुझे कि मुझसे सुंदर कोई है ही नहीं। यह रोज़ का किस्सा बन गया सुबह छह बजे खिड़की की और स्वत: ही नज़र चली जाती थी। उठी तो वैसे ही रहती थी पढ़ने के लिए किन्तु घर में कहीं भी हूँ भाग कर जाफ़री, (हाँ, यही कहते थे अंग्रेजों के ज़माने में बने उन क्वाटर्स के आखिरी कमरे को) में पहुँच जाती थी। दिन में हम सहेलियाँ भी सैर को उस घर के आगे से निकलती थी हंसती हुई और जानबूझ कर ऊँची आवाज़ में बात करती हुई और आखिरकार 'उसने' आँखे उठाकर देख ही लिया। वाओ ! एक जीत का अहसास हुआ, मानो क़िला फ़तह कर लिया हो हमने।
"चलो अपनी और बातें फिर बताउंगी, अभी बच्चों के स्कूल से वापस आने का समय हो गया है। तुम भी बहुत मज़े लेकर सुन रहे हो, है ना ?" सुगंधा ने टेलीफोनिक साक्षात्कार को वहीं रोक, अगले दिन का समय निश्चित किया और रसोई में जाकर खाने-पीने की तैयारी में ऐसे लग गयी जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह रसोई का काम, कपडे धोना, घर साफ़ करना आदि-आदि के साथ फ्रिलॉंस रिपोर्टिंग करना उसकी दिनचर्या में शामिल जो था। इसी सिलसिले में स्वप्निल ने उससे साक्षात्कार प्लान कर लिया था।" एक दिन मैंने जब खिड़की को खुले नहीं देखा तो बैचैनी-सी होने लगी-कहीं उसने घर छोड़ तो नहीं दिया ? कहीं वो बीमार तो नहीं हो गया ? ऐसे ही अनगिनत सवालात ज़हन में उठने लगे" सुगंधा खोई-खोई सी बोलती चली जा रही थी और स्वप्निल अपना माइक लिए उसके सामने बैठा उसके चेहरे के उतार-चड़ाव बड़े गौर से देख रहा था। आज वह उससे अपॉइंटमेंट ले घर ही आ गया था। "अचानक ही 'वह' (आज भी उसका नाम मुझे मालूम नहीं, क्यूंकि कभी बात ही नहीं हुई) आया और ताला खोलने लगा। मैंने चैन की सॉंस ली और वापस पढ़ने ही बैठने वाली थी कि 'उसने' नज़रे घुमाकर चुपके से मेरे घर की ओर देखा। ओह ! मैं झट से नीचे बैठ गयी। कहीं वो मुझे देख न ले उसे देखते हुए। इतने दिन से दिल में एक चाह थी कि 'वो' मुझे देखे तो सही और उस जब उसने देखा तो न जाने कितनी ही अनजान लहरें मेरे दिल में एक साथ ही उठ गयी मानो कोई तूफ़ान ही न आ जाये', सुगंधा मुस्कुराते हुए कहती जा रही थी।
स्वप्निल ने कुछ कहने के लिए अभी मुँह ही खोला था पर न जाने क्या सोच कर चुप हो गया और सुगंधा के हाव-भाव ऐसे देखने लगा जैसे आवाज़ के साथ वो भी माइक में रिकॉर्ड कर लेगा। "मुझे वहाँ न पाकर 'वो' अन्दर चला गया और मैं वहीं बुत बनी सोचती रह गयी कि आखिर ये मुझे हुआ क्या है" सुगंधा बोलती जा रही थी." स्नेहा जब शाम को साथ पढ़ने आई तो उसे मैंने सब बताया। उसने कहा कि चल 'उसके' घर के आगे घूम के आते हैं। मैं भी पगलाई-सी 'उसकी' एक नज़र फिर से पाने को चल पड़ी। हमारी आवाजें सुनके 'वो' बाहर आया, हाथ में तब भी किताब ही थी। 'उसने' हम दोंनो को देखा और अनमना-सा वापस चला गया। फिर तो कमाल ही हो गया, शाम को खिड़की से 'उसका' चेहरा नज़र आने लगा। वो भी मेरी तरह घूम-घूम के पढ़ने लगा था। नज़र से नज़र मिलती थी और बस फिर अपनी-अपनी पढ़ाई में लग जाते थे हम दोनों। अब वो अपने हाथ में एक गुलाब का फूल भी लेकर पढ़ने लगा था। हम सहेलियॉं यह देख बहुत ज़ोर–ज़ोर से हँसती थी और मुझे लगा कि प्रोजेक्ट ओवर।’ "स्वप्निल ! जब मैं परीक्षा के बाद अपनी बुआ के घर कुछ दिन रह कर वापस आई तो मेरी निग़ाहें बरबस ही उसकी खिडकी की ओर मुड गयीं। वहाँ कोई नहीं था, न ही किसी के होने का आभास ही। पढ़ाई के बहाने से टीना के घर गयी तो पता चला कि 'उसने' बिना कोई कारण बताये रूम छोड़ दिया था।" इतना कहते ही सुगंधा की आँखों में आँसू की बूँदें छलक आयीं और वह भीतर चली गयी। स्वप्निल सोच रहा था, ये कौन सा अहसास था जो आज भी सुगंधा को छुए था’।

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