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Thursday, May 1, 2014

Ghazal--------- Geetabh mei prakashit ........


कुछ तिरा दर्द भी सताता है ||
कुछ ज़माना भी कह्र ढाता है ||
इक तसव्वुर तेरा है दुश्मन सा | जो मुझे रात भर जगाता है ||
तर्क तूने ताल्लुकात किये | फिर मुझे किसलिए बुलाता है ||
ये बता क्या तू खुश है इसमें ज़रा | दिल मेरा जो तू यूँ दुखाता है ||
इक ख़ुशबू सी छाने लगती है | जब तू मेरे करीब आता है ||

दिल तो दुश्मन था मुहब्बत का ,मगर | वक़्त भी ज़ुल्म बहुत ढाता है ||
मैंने दुनिया लुटा दी तेरे लिए | और तू मुझको आजमाता है ||
आज 'पूनम' की रात है यानी | वो ग़ज़ल कोई गुनगुनाता है||.....पूनम माटिया 'पूनम'