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Saturday, May 11, 2013

निश्चय की चमक .............

नंदिता, फिल्म की नायिका की भूमिका निभाती आई है अब तक ...अपने शहर का क्या कहें पूरे देश में उसके नाम की गूँज है ....पर जब गूँज उसकी बड़ी सी कोठी में पहुँचती है तो न जाने क्यूँ .वहां की मृत पर्याय चुप्पी से टकराकर ,वो भी शांत हो जाती है ......नंदिता कितने ही बड़े एल सी डी टी वी पे अपनी या औरों की फिल्म देख ले ......गीत पूरे वॉल्यूम पे सुंनले ....हाई वॉल्यूम स्पीकर्स भी उसके अंतर्मन की चुप्पी को भेद नहीं पाते .......नितांत अकेला महसूस करती है वह .जब भी शूटिंग ख़त्म कर घर (सिर्फ कहने मात्र को ) आती है .......माँ -बाप ने तो बहुत पहले ही उससे किनारा कर लिया था जब उसने फिल्मी दुनिया में जाने का अपना निर्णय सुनाया था .......दोस्त-रिश्तेदार तो फिर भी शोहरत में भागीदार बनने के लिए दौड़े चले आये थे ......''हमारी अपनी नंदिता .....हमारे हाथों में खेली -पली बड़ी'' और न जाने कैसे कैसे जुड़ाव लिए .......भीड़ सी जमा हो जाती है जब भी कोई फिल्म रिलीज़ होती है या हिट होती है .......एक खास मित्र था ......उसे भी फ़िल्मी दुनिया ने दूर कर दिया .....क्योंकि वो रात दिन की शिफ्ट्स ........देश-विदेश के लम्बे ट्रिप सह नहीं पाया और शादी कर ली .................


कहने को ज़माना 'फैन' है नंदिता का .......हजारों की तादाद में चिठ्ठियाँ ,इ मेल्स ,फ़ोन कॉल्स आती हैं लेकिन उन्हें तो सेक्रेटरी सम्भालता है ........पत्रिकाओं और अखबारों में छपी तस्वीरें भी कब तक दिल बहलाती ........अन्दर ही अन्दर खोखली होती जा रही है नंदिता दिन ब दिन ......दिन तो फिर भी शूटिंग के शोर-ओ-गुल में कट जाते रहे है .......लेकिन शाम होते-होते एक अजीब सी उदासीनता उसे घेरने लगती है .....कहने को बहुत से बॉय फ्रेंड्स थे ..........पर कोई भी शरीर से मन की दूरी तय नहीं कर पाया अब तक .....रात के सन्नाटे खाए जाते हैं ......... सारी जिन्दगी आँखों के आगे चलचित्र सी दौड़ जाती है ........खिड़की से झांकता चाँद भी जैसे मूंह चिढाने लगता है .......मानो कह रहा हो .......क्या करोगी इस सुंदर चेहरे ......इस दिलकश बदन का .........जब कोई है ही नहीं इसे निहारने ,सहलाने, सवारने के लिए ......कोई नहीं जो दिल में कही गहरे जा बसी तन्हाई को अपने प्यार से दूर करे .....कोई जो घंटों बैठ कर उससे बात करे ........कुछ ही साल पहले तो 'वो' था जो उसका (सिर्फ उसका) साथ चाहता था ....नंदिता को देखना, उसकी चुप्पी को सुनना , उसकी आँखों को पढना .........कितना पसंद था उसे ........!!!!!!!!! और आज ........सोचते-सोचते नंदिता को कब नींद आ जाती है .......कब उसके सिरहाने रखी डायरी के पन्नो में आंसुओं की नमी घर कर जाती है ..........पता नहीं चलता ...........और सुबह के चमकते सूर्य की रौशनी में नंदिता फिर एक व्यस्त दिन के लिए मेक अप और गौगल्स में आँखों की स्याही छुपाकर तैयार हो जाती है .........सिलसिला है .....न जाने कब और कहाँ थमेगा .......??????????????????

हर किसी प्रसिद्द परन्तु अकेली नायिका की कहानी की तरह नंदिता की जिन्दगी भी यूँही गुज़रे .........ये उसे मंजूर नहीं था .....कैसे वो अपने को एक अबला नारी की तरह किस्मत के सहारे छोड़ दे ....कैसे फ़िल्मी चकाचौंध में वह अंधियारी गलियों में खोती चली जाए ......कैसे किसी पुरुष साथी के न मिलने की चाह को अपने ऊपर हावी होने दे ...........दूर........भविष्य में किसी अकेले से कमरे में अत्यधिक शराब के नशे में ख़ुदकुशी की खबर को .........अखबार की सुर्खियाँ बनने दे ......?........यही सोच नंदिता के कदमो में एक अनजाना सा उत्साह ले आई .........और उसके कदम आज एक वृद्धाश्रम की ओर मुड गए स्वत: ही ......वहां एक वृहद् वृक्ष के नीचे बैठी खुद से बतियाती बूढी अम्मा के नज़दीक जा नंदिता पूर्ण संतुष्टि से उसको पीठ पे सहलाने लगी ........अम्मा मुड़ी ......नंदिता की आँखों में एकटक देखने लगी ......नंदिता ने उसके कमज़ोर, कंपकंपाते झुरियों से भरे हाथ अपने हाथ में लिए .......और धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया ....कहीं भीतर ऐसा लगा जैसे उसे खुद को ही कोई हलके हलके थपथपा रहा हो .....मोबाइल पर घंटी बज रही थी ..बजती ही जा रही थी .........पर आज नंदिता को स्टूडियो जाने की कतई जल्दी नहीं थी ..........वह आज निश्चय कर चुकी थी .......और उसकी आँखें अपने निश्चय की प्रतीक बन चमक रही थी ख़ुशी से ..........एक ऐसी ख़ुशी जो अब उसके साथ रहने वाली थी ..............लम्बे समय तक .........................!!!!!!!


पूनम माटिया 
9/5/2013
poonam.matia@gmail.com