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Tuesday, October 14, 2014

परवाज़ .........


सभी रंग जहाँ के 
इक तितली में 
सिमट आये हैं 
मानो मेरे अरमानो के 
पंख निकल आये हैं|

हथेली खोलकर
उड़ा दिए नभ में
दिल में रखकर
भी क्या होता?

क्यूँ न ये
परवाज़ पा जाएँ?
क्यूँ न ये
अम्बर नाप आयें ?

क्यूँ भीतर ही भीतर
दबा के इनको
दफ्न कर दें
अपनी हर चाह को ?

ज़मी पे रहें
आज पाँव, बेशक
जंजीर ज़माना
पहनाये , बेशक

न कोई बंदिश
न पहरा कोई
खुला हो गगन
न सैयाद कोई

उड़ के क्षितिज को
क्यूँ न आज छू लें?
बंद मुठ्ठियों से निकलके
शायद ये ‘तितली’
आफ़ताब छू ले !!! ......



पूनम माटिया'पूनम'