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Thursday, September 6, 2012

कह दो दिल खोल कर.............



चाहती तो कहना बहुत कुछ थी,मगर शिकन देख
जाने क्यों थाम लिया खुद को, सी लिए लब 

सुना था कि बातों में बात बड जाती है 
यही एक बात लबों पे ताला लगा जाती है

काश कि कोई चाबी उनके दिल की मिले
तो फिर क्यूँ बड़े यूँ शिकवे-गिले

आसां हो जाये दिल तक पहुंचना
न चुप रहना, न तिल का ताड़ बनना

ग़लतफ़हमी की बेल बेलगाम होती है
अक्सर इसके फलों में कड़वाहट बसी होती है

कहते हैं लोग - कह दो दिल खोल कर
क्यूँ बाद में पछताना बातों को नाप-तोलकर

थी आँखों में नमी और दिल में तूफ़ान-ऐ-ज़ज्बात
पर रोका न खुद को ,बस कह दी अपने दिल की बात

कहते ही सिंधु समान अश्रु-सगर उमड़ पड़ा
दिल था जो भारी,हल्का हो बादल-सम उड़ चला

मुस्कुरा के देखा उन्होंने ,खोले अपने भी दिल के पाट
मेरे दिल में भी खिल उठे आज फिर सूर्ख गुलाब ........................पूनम.