मेरी मित्र सूची - क्या आप सूची में है ?

Thursday, September 6, 2012

कह दो दिल खोल कर.............



चाहती तो कहना बहुत कुछ थी,मगर शिकन देख
जाने क्यों थाम लिया खुद को, सी लिए लब 

सुना था कि बातों में बात बड जाती है 
यही एक बात लबों पे ताला लगा जाती है

काश कि कोई चाबी उनके दिल की मिले
तो फिर क्यूँ बड़े यूँ शिकवे-गिले

आसां हो जाये दिल तक पहुंचना
न चुप रहना, न तिल का ताड़ बनना

ग़लतफ़हमी की बेल बेलगाम होती है
अक्सर इसके फलों में कड़वाहट बसी होती है

कहते हैं लोग - कह दो दिल खोल कर
क्यूँ बाद में पछताना बातों को नाप-तोलकर

थी आँखों में नमी और दिल में तूफ़ान-ऐ-ज़ज्बात
पर रोका न खुद को ,बस कह दी अपने दिल की बात

कहते ही सिंधु समान अश्रु-सगर उमड़ पड़ा
दिल था जो भारी,हल्का हो बादल-सम उड़ चला

मुस्कुरा के देखा उन्होंने ,खोले अपने भी दिल के पाट
मेरे दिल में भी खिल उठे आज फिर सूर्ख गुलाब ........................पूनम.

13 comments:

  1. मुस्कुरा के देखा उन्होंने ,खोले अपने भी दिल के पाट
    मेरे दिल में भी खिल उठे आज फिर सूर्ख गुलाब ..... बहुत खूब पूनम जी साधुवाद...

    ReplyDelete
    Replies
    1. डॉ ओ पी वर्मा जी बहुत आभार

      Delete
  2. Replies
    1. kavita ji shukriya ....mujhe khushi hai ki aapne yahan aakar mujhe protsahit kiya ....I cant thank u enough :)))))))

      Delete
  3. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  4. kitni gahrai se likha hai apne. padhte samay doobta chala gaya per gahrai maap na saka. bahut bahut sunder...........

    ReplyDelete
    Replies
    1. shukriya .......Atul :) aapki pratikriya bahut maayne rakhti hai :)

      Delete
  5. very good poonam ji

    मैं जाकर ख्‍वाब की दुनिया में जितना जगमगाया हूँ
    खुली है आंख तो उतना ही खुद पे सकपकाया हूँ

    मुझे बाहर के रस्‍तों पर नहीं कांटों का डर कोई
    वो सब अंदर के हैं बीहड़ मैं जिनपे डगमगाया हूँ

    हां अब भी शाम को यादों के कुछ जुगनू चमकते हैं
    मैं बेशक सारे खत लहरों के जिम्‍मे छोड़ आया हूँ

    तुम्‍हारे ख्‍वाब की ताबीर से वाकिफ हैं सारे ही
    मैं अपने ख्‍वाब की सूरत का इक धुंधला सा साया हूँ

    मुझे तुमसे नहीं शिकवा मगर "मोहन" से तो है
    मैं बन कर आंख तेरी अब तलक क्‍यों डबडबाया हूँ

    ReplyDelete
  6. मोहन जी शुक्रिया .....:)
    मुझे बाहर के रस्‍तों पर नहीं कांटों का डर कोई
    वो सब अंदर के हैं बीहड़ मैं जिनपे डगमगाया हूँ// सटीक और खूब कहा ......येही भीतर का डर हमें खुलने नहीं देता

    ReplyDelete