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Sunday, January 20, 2013

वक्त की करवटें .........




तन्हाई में अक्सर ये ख़याल मुझे आता है 
इंसा सोचता कुछ है हो कुछ और जाता है




वक्त की करवटों ने बदल दिया इतना मुझे 
आइना भी देखूं तो अजनबी नज़र आता है



माटी के बर्तन प्लास्टिक की गुडिया खेलते थे
सोचा किसने था ये वक्त लौट के कहाँ आता है



भीड़ ख्यालात की इतनी रहने लगी ज़हन में 
खुद से मिलने का भी वक्त कहाँ मिल पाता है



खिलखिलाके यूँही हंस देते थे हर बात पे हरदम 
अब तो हंसने की बात पे भी हंसा कहाँ जाता है




मिलने के बहाने खोजा करते थे जिससे पल-पल 
अब उस शक्स का ख्याल भी पूनम कम आता है...............पूनम'पिंक'