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Sunday, January 20, 2013

वक्त की करवटें .........




तन्हाई में अक्सर ये ख़याल मुझे आता है 
इंसा सोचता कुछ है हो कुछ और जाता है




वक्त की करवटों ने बदल दिया इतना मुझे 
आइना भी देखूं तो अजनबी नज़र आता है



माटी के बर्तन प्लास्टिक की गुडिया खेलते थे
सोचा किसने था ये वक्त लौट के कहाँ आता है



भीड़ ख्यालात की इतनी रहने लगी ज़हन में 
खुद से मिलने का भी वक्त कहाँ मिल पाता है



खिलखिलाके यूँही हंस देते थे हर बात पे हरदम 
अब तो हंसने की बात पे भी हंसा कहाँ जाता है




मिलने के बहाने खोजा करते थे जिससे पल-पल 
अब उस शक्स का ख्याल भी पूनम कम आता है...............पूनम'पिंक' 

26 comments:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 23/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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    1. Yashodha जी नमस्कार एवं धन्यवाद मेरी रचनाओ को अपना स्नेह देने के लिए

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  2. Vah ki Hava men meri to yahi duva hai ki aapke kadam sada anoopam rahe poonam-ji

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    1. हरीश जी आप ने दुआओं में मुझे स्थान दिया ...हृदय से आभारी हूँ

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  3. बहुत खूब, क्या लिखा है, दिल के अरमानों को कलम के जरिए शीशे पर उतारकर रख दिया,,, सच में बेहद खूब। माशाअल्लाह....

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    1. खुला मंच .....स्वागत एवं आभार ...

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    1. यशवंत जी शुक्रिया

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  5. poonam ji swagat hai nai rachna ke sath likhte rahiye,God bless u

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    1. सरिता जी प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया

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  6. वक्त की करवटों ने बदल दिया इतना मुझे
    आइना भी देखूं तो अजनबी नज़र आता है
    bahut khoob ji

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    1. ओम पुरोहित जी .......आप का सदैव स्वागत है ......धन्यवाद

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    2. वक्त की करवटों ने बदल दिया इतना मुझे
      आइना भी देखूं तो अजनबी नज़र आता है

      बहुत सुंदर .बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

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    3. शुक्रिया मदन जी ....आपके प्रोत्साहन के लिए

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  7. वक्त की करवटों ने बदल दिया इतना मुझे
    आइना भी देखूं तो अजनबी नज़र आता है

    ...बहुत खूब! बेहतरीन प्रस्तुति...

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  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .........

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  9. अपने भावो को बहुत सुंदरता से तराश कर अमूल्य रचना का रूप दिया है.

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    1. संजय भास्कर जी हार्दिक धन्यवाद

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  10. हर शब्द की आपने अपनी 2 पहचान बना दी क्या खूब लिखा है "उम्दा "
    वहा वहा क्या खूब लिखा है जी आपने सुबान अल्ला
    मेरी नई रचना

    प्रेमविरह

    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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    1. दिनेश ........शुक्रिया ......यहाँ तक आने के लिए ...और निमंत्रण हेतु

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  11. http://youtu.be/OHTDrF9Emwg .. APNE TO ITIHAS RACH DIYA AB HAMARI BARI HAI..

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    1. yasho .........Maine kahan kuchh kiya abhi ....:) aap to chha rahe hain

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  12. भीड़ ख्यालात की इतनी रहने लगी ज़हन में
    खुद से मिलने का भी वक्त कहाँ मिल पाता है...........wah bahut sundar ..Poonam...

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    1. sach hi kaha hai na :))))))))) shukriya naresh

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